जापानी येन (Japanese Yen) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पिछले 40 सालों के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। इस बड़ी गिरावट ने ग्लोबल येन कैर्री ट्रेड (Global Yen Carry Trade) के अचानक बंद होने का खतरा बढ़ा दिया है, जिससे उभरते बाज़ारों, जिनमें भारत भी शामिल है, में उथल-पुथल मच सकती है।
Detailed Coverage
येन की ऐतिहासिक गिरावट का कारण
जापानी येन की कीमत 163 येन प्रति डॉलर के पार निकल गई है, जो करीब चार दशकों में नहीं देखा गया। इस बड़ी गिरावट की मुख्य वजह जापान का बढ़ता ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) है, जो जून 2026 तक 406.9 बिलियन येन तक पहुंच गया। कच्चे तेल जैसी कमोडिटीज़ (Commodities) के आयात की ऊंची लागत ने येन पर भारी दबाव डाला है। इससे बैंक ऑफ जापान (BOJ) के लिए अपनी लंबे समय से चली आ रही अल्ट्रा-लूज़ मॉनेटरी पॉलिसी (Ultra-loose Monetary Policy) को लेकर मुश्किल खड़ी हो गई है।
ग्लोबल लिक्विडिटी पर असर
सालों से, येन ग्लोबल कैर्री ट्रेड के लिए पसंदीदा करेंसी रही है। जापान में ब्याज दरें करीब शून्य रहने के कारण, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए कम लागत पर येन उधार लेकर दूसरे देशों में ज़्यादा रिटर्न वाली एसेट्स (Assets) में निवेश करना आसान था। इस स्ट्रैटेजी (Strategy) ने ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स को काफी लिक्विडिटी (Liquidity) प्रदान की। लेकिन, अगर बैंक ऑफ जापान येन को बचाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाता है, तो इस उधार की लागत बढ़ जाएगी। ऐसे में निवेशकों को अपने येन लोन चुकाने के लिए अपने ग्लोबल एसेट्स बेचने पड़ेंगे। इसे 'अनवाइंडिंग' (Unwinding) कहा जाता है, जिससे ग्लोबल स्टॉक मार्केट्स में अचानक और तेज बिकवाली का दबाव आ सकता है।
पिछला अनुभव और मार्केट की चिंता
निवेशक 2024 की गर्मियों में देखी गई अस्थिरता को याद कर रहे हैं, जब येन 162 से 153 तक तेजी से गिरा था। उस समय, BOJ की एक सरप्राइज रेट हाइक (Rate Hike) और करेंसी मार्केट में दखलअंदाजी के कारण लीवरेज्ड पोजीशन (Leveraged Positions) की भारी बिकवाली हुई थी, जिससे ग्लोबल इक्विटी मार्केट्स (Equity Markets) लड़खड़ा गए थे। मौजूदा स्थिति उन्हीं चिंताओं को ताज़ा कर रही है, क्योंकि पॉलिसी मेकर्स (Policymakers) ने फिर से करेंसी को स्थिर करने के लिए निर्णायक कार्रवाई करने का संकेत दिया है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
हालांकि भारत सीधे तौर पर इन येन-फंडेड ट्रेडों का लक्ष्य नहीं है, लेकिन यह ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम का हिस्सा है। अगर ग्लोबल फंड्स को लिक्विडिटी की कमी का सामना करना पड़ता है, तो वे अक्सर नकदी जुटाने के लिए उभरते बाज़ारों में अपना निवेश कम कर देते हैं। फिलहाल, जापानी निवेशक भारतीय इक्विटीज़ में करीब ₹1.94 लाख करोड़ का निवेश रखते हैं। यह कुल विदेशी निवेश का एक छोटा सा हिस्सा है, लेकिन एक व्यापक ग्लोबल बिकवाली भारतीय शेयर की कीमतों और रुपये पर अप्रत्यक्ष दबाव डाल सकती है।
हालांकि, भारतीय बाज़ार ने डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Domestic Institutional Investors) के मजबूत समर्थन और सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) के ज़रिए लगातार मंथली फ्लो (Monthly Flows) के कारण मजबूती दिखाई है। ये घरेलू कारक ग्लोबल झटकों के खिलाफ एक संभावित कुशन का काम करते हैं। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अपडेट बैंक ऑफ जापान की ओर से ब्याज दरों को लेकर कोई भी आधिकारिक कदम होगा, क्योंकि यही तय करेगा कि कैर्री ट्रेड किस गति से अनवाइंड होगा। ग्लोबल मार्केट वोलेटिलिटी इंडेक्स (Volatility Indices) और करेंसी में उतार-चढ़ाव पर नज़र रखने से इस स्थिति के विकसित होने के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं।
