वर्ल्ड बैंक (World Bank) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 तक दुनिया की आर्थिक ग्रोथ सबसे धीमी रहने का अनुमान है, जो कोरोना महामारी के बाद का सबसे खराब दौर होगा। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों में उछाल इसके मुख्य कारण बताए जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इससे ऊर्जा की लागत बढ़ेगी और व्यापार संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
क्या है मामला?
वर्ल्ड बैंक की नई 'ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स' रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था कोरोना महामारी के बाद के सबसे कमजोर दौर की ओर बढ़ रही है। संस्था का अनुमान है कि 2026 तक ग्लोबल ग्रोथ घटकर 2.5% रह जाएगी, जो 2025 में 2.9% अनुमानित थी। इस गिरावट का असर दुनिया की करीब दो-तिहाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को इसका मुख्य कारण बताया गया है। इसके अलावा, एनर्जी मार्केट में गड़बड़ी, बढ़ती महंगाई और टाइट फाइनेंशियल कंडीशंस (कठोर वित्तीय हालात) आर्थिक गतिविधियों को धीमा कर रहे हैं।
एनर्जी और महंगाई का खतरा
रिपोर्ट में एनर्जी मार्केट्स की अस्थिरता एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आई है। वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि इस साल ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतें औसतन $94 प्रति बैरल तक जा सकती हैं। यह 2025 के स्तर से 36% ज्यादा होगा। यह अनुमान इस शर्त पर आधारित है कि जुलाई तक प्रमुख शिपिंग रूट्स, जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), के आसपास सप्लाई की दिक्कतें खत्म हो जाएंगी।
भारत जैसे तेल आयात करने वाले देश के लिए यह अनुमान बहुत मायने रखता है। कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें सीधे तौर पर देश के इंपोर्ट बिल (आयात बिल) को बढ़ाती हैं, जिससे व्यापार संतुलन (trade balance) और भारतीय रुपये पर दबाव पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बढ़ती ऊर्जा लागत से फर्टिलाइजर (खाद) की कीमतें भी बढ़ेंगी, जिससे ग्लोबल फूड इन्फ्लेशन (खाद्य महंगाई) बढ़ेगी। वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि 2026 तक ग्लोबल इन्फ्लेशन बढ़कर 4% हो जाएगी, जो 2025 में 3.3% थी। इसका मतलब है कि सेंट्रल बैंक्स को महंगाई को काबू में रखने के लिए ब्याज दरों को लंबा खींचना पड़ सकता है।
डेवलपिंग इकोनॉमीज़ के लिए चुनौतियां
डेवलपिंग और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं (Emerging and developing economies) एक मुश्किल माहौल का सामना कर रही हैं। वर्ल्ड बैंक को उम्मीद है कि इन क्षेत्रों में ग्रोथ 2025 के 4.4% से घटकर 2026 में 3.6% रह जाएगी। यहां एक बड़ी समस्या बढ़ता हुआ कर्ज है। इन देशों का कुल सरकारी कर्ज 2010 में GDP के 40% से कम था, जो आज 70% से ऊपर चला गया है। इससे सरकारों के पास जरूरी सेवाओं पर खर्च करने या झटकों से निपटने के लिए कम पैसा बचता है।
ग्लोबल फाइनेंशियल सपोर्ट
इन जोखिमों से निपटने में देशों की मदद के लिए, वर्ल्ड बैंक $60 बिलियन तक का फाइनेंस (वित्तपोषण) जुटा रहा है, और अगर हालात बिगड़ते हैं तो इसे $100 बिलियन तक बढ़ाया जा सकता है। इस फंड का मकसद सोशल सेफ्टी नेट (सामाजिक सुरक्षा जाल), सरकारी फाइनेंस को मजबूत करना और एग्रीकल्चर (कृषि) व छोटे व्यवसायों जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर्स को लिक्विडिटी (तरलता) प्रदान करना है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
मौजूदा ग्लोबल इकोनॉमिक माहौल एक जटिल तस्वीर पेश कर रहा है। निवेशक अक्सर तेल की कीमतों पर करीब से नजर रखते हैं, क्योंकि यह भारतीय अर्थव्यवस्था पर टैक्स की तरह काम करती है और कॉर्पोरेट मार्जिन्स को प्रभावित करती है, खासकर मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और एविएशन जैसे सेक्टर्स के लिए। जब ग्लोबल इन्फ्लेशन बढ़ता है, तो कंपनियों के लिए रॉ मैटेरियल्स (कच्चा माल) की लागत बढ़ जाती है, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन्स पर दबाव पड़ सकता है अगर वे इस लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाते।
इसके अलावा, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता सरकारी कर्ज कैपिटल फ्लो (पूंजी प्रवाह) में अस्थिरता ला सकता है। अगर ग्लोबल फाइनेंशियल कंडीशंस बहुत सख्त हो जाती हैं, तो विदेशी निवेशक अधिक सतर्क हो सकते हैं, जिसका असर इमर्जिंग मार्केट स्टॉक एक्सचेंजों की लिक्विडिटी पर पड़ सकता है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, निवेशक कुछ प्रमुख इंडिकेटर्स (संकेतकों) पर नजर रखेंगे। पहला, एनर्जी सप्लाई चेन और क्रूड ऑयल की कीमतों पर कोई भी नया अपडेट महत्वपूर्ण होगा। दूसरा, डोमेस्टिक इन्फ्लेशन डेटा, जैसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI), यह दिखाएगा कि इंपोर्टेड एनर्जी की लागत भारतीय अर्थव्यवस्था में कितनी पास हो रही है। आखिर में, प्रमुख सेंट्रल बैंक्स की ब्याज दरों पर कमेंट्री अहम होगी, क्योंकि ग्लोबल स्तर पर ऊंची दरें कंपनियों के लिए उधार लेने की लागत और सरकार के फिस्कल हेल्थ (वित्तीय स्वास्थ्य) को प्रभावित करती हैं। निवेशक भारतीय रुपये की डॉलर के मुकाबले चाल पर भी नजर रख सकते हैं, जो बाहरी दबाव का एक पैमाना होगा।
