वर्ल्ड बैंक का नया आउटलुक: भारत की आर्थिक रफ्तार पर क्या है तस्वीर?
वर्ल्ड बैंक ने हाल ही में भारत के लिए अपने आर्थिक आउटलुक को अपडेट किया है। 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर (FY27) के लिए, उन्होंने देश की ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.6% कर दिया है। यह पिछले अनुमान में 0.3% का इजाफा है। हालांकि, यह 7.6% के पिछले साल के अनुमान से एक महत्वपूर्ण गिरावट दिखाता है।
मंदी की आहट और डोमेस्टिक डिमांड की ताकत
यह अनुमान ऐसे समय में आया है जब 2026-27 में ग्रोथ धीमी होने की उम्मीद है। इसके पीछे की मुख्य वजहें हैं - पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष, जिससे ग्लोबल एनर्जी की कीमतों में अनिश्चितता बनी हुई है, और भारत के प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर देशों की धीमी होती आर्थिक रफ्तार, जिसका असर एक्सपोर्ट्स पर पड़ सकता है।
हालांकि, भारतीय इकोनॉमी की असली ताकत इसकी डोमेस्टिक डिमांड बनी हुई है। अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 7.8% रही थी, जो उम्मीदों से कहीं बेहतर थी। आसान GST रेट्स और पिछले समय में कम इंफ्लेशन के चलते प्राइवेट खर्च भी काफी मजबूत रहा है। रिटेल सेल्स अच्छी हैं और कंज्यूमर कॉन्फिडेंस में भी बढ़त देखी गई है।
इंफ्लेशन और एक्सपोर्ट्स पर बढ़ता दबाव
बढ़ती ग्लोबल एनर्जी की कीमतों का असर भारत में इंफ्लेशन पर पड़ने की आशंका है। इससे अगले फाइनेंशियल ईयर में लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो सकती है, जो कंज्यूमर स्पेंडिंग को धीमा कर सकता है। सरकार को कुकिंग फ्यूल और फर्टिलाइजर पर सब्सिडी बढ़ाकर खर्च करना पड़ सकता है, जिससे सरकारी खर्च में भी नरमी आ सकती है। ग्लोबल अनिश्चितता और बढ़ती लागतों के कारण इन्वेस्टमेंट ग्रोथ में भी धीमी रफ्तार की उम्मीद है।
भारत के मुख्य एक्सपोर्ट मार्केट, जैसे कि यूएस (US) और ईयू (EU), में आर्थिक ग्रोथ धीमी हो रही है। इससे भारत के एक्सपोर्ट्स पर दबाव पड़ सकता है। 2025 में गुड्स एक्सपोर्ट्स में सिर्फ 0.1% की मामूली बढ़ोतरी हुई थी। हालांकि, सर्विसेज एक्सपोर्ट्स ने अच्छा प्रदर्शन किया है, जो दिसंबर से फरवरी के बीच लगभग 16% बढ़ा है, जिसने गुड्स एक्सपोर्ट्स की सुस्ती को कुछ हद तक संभाला है।
बड़े रिस्क फैक्टर
इस अनुमान में कई बड़े रिस्क भी छिपे हैं। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन एनर्जी कीमतों को ऊंचा रख सकती है, जिससे इंफ्लेशन और सरकारी घाटे बढ़ सकते हैं। यूएस (US) और ईयू (EU) जैसी बड़ी इकोनॉमी में मंदी गहराने से एक्सपोर्ट डिमांड में भारी गिरावट आ सकती है। ट्रेड प्रोटेक्शनिज्म (व्यापार संरक्षणवाद) का बढ़ना भी भारत के एक्सपोर्ट्स के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। इसके अलावा, सब्सिडी का बढ़ता खर्च सरकारी खजाने पर दबाव डाल सकता है, और इंफ्लेशन बढ़ने पर मॉनेटरी पॉलिसी को टाइट करना पड़ सकता है, जो डोमेस्टिक खर्च और इन्वेस्टमेंट को और धीमा कर सकता है।
साउथ एशिया का संदर्भ
पूरे साउथ एशिया रीजन की बात करें तो, 2025 में अनुमानित 7% की ग्रोथ के मुकाबले 2026 में यह 6.3% तक धीमी होने की उम्मीद है, जो 2027 में सुधरकर 6.9% हो सकती है। भारत की इकोनॉमी इस रीजन की ग्रोथ को मुख्य रूप से बढ़ा रही है, लेकिन वैश्विक चुनौतियां उसके पड़ोसी देशों की तरह ही भारत को भी प्रभावित कर रही हैं।