World Bank की पॉलिसी में बड़ा बदलाव!
World Bank ने दशकों पुरानी अपनी सोच को पलट दिया है और अब 'इंडस्ट्रियल पॉलिसी' की अहमियत को स्वीकार किया है। संस्था का कहना है कि उसकी पहले की वो सलाह, जो इंडस्ट्रियल पॉलिसी के खिलाफ थी, अब "आउटडेटेड" हो चुकी है। यह बदलाव ग्लोबल सप्लाई चेन (Supply Chain) में बढ़ते जोखिमों और जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) को देखते हुए किया गया है।
क्यों बदली World Bank की सोच?
प्रगटिज्म (Pragmatism) ने पुराने विचारों को पछाड़ा:
World Bank की मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में अब इंडस्ट्रियल पॉलिसी का खुलकर समर्थन किया गया है। यह 1993 के उस रुख के ठीक विपरीत है, जिसमें इस पॉलिसी को बेकार बताया गया था। संस्था के चीफ इकोनॉमिस्ट इंडरमिट गिल का कहना है कि पुरानी सलाह ने सरकारी हस्तक्षेप को "कलंकित" किया था। इसका एक उदाहरण 1970 के दशक में दक्षिण कोरिया की 'हेवी केमिकल इंडस्ट्री' ड्राइव है, जिससे उस सेक्टर में 128% की ग्रोथ हुई और सालाना जीडीपी ग्रोथ में करीब 3% का इजाफा हुआ।
अब फोकस इस बात पर नहीं है कि सरकारें हस्तक्षेप करें या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि वे इसे "कितनी अच्छी तरह" कर सकती हैं। यह बड़ा बदलाव US, EU और चीन जैसे देशों के कदमों से मेल खाता है। अमेरिका अपने 'चिप्स एक्ट' (CHIPS Act) और 'इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट' (Inflation Reduction Act) के ज़रिए सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी को भारी सब्सिडी दे रहा है। EU भी अपने प्रोजेक्ट्स में स्थानीय सामानों के इस्तेमाल पर जोर दे रहा है। चीन भी टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी मदद दे रहा है।
सरकारी मदद की ओर बढ़ता विश्व:
ऐतिहासिक रूप से, फ्री-मार्केट (Free-market) और स्टेट-लेड डेवलपमेंट (State-led development) के बीच बहस चलती रही है। World Bank अक्सर "वॉशिंगटन कंसेंसस" (Washington Consensus) के तहत लोन देते समय देशों को डीरेग्युलेशन (Deregulation) और प्राइवटाइजेशन (Privatisation) के लिए कहता था। लेकिन अब इंडस्ट्रियल पॉलिसी सिर्फ सब्सिडी या टैरिफ (Tariffs) तक सीमित नहीं है। इसमें R&D (Research and Development) में निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) बनाना, और स्किल्स ट्रेनिंग (Skills Training) जैसे कदम शामिल हैं। नेशनल डेवलपमेंट बैंक (National Development Banks) इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं।
चीन का सेमीकंडक्टर पर 2014-2023 के बीच 142 अरब डॉलर का खर्च, अमेरिका के 39 अरब डॉलर से कहीं ज्यादा है। यह दिखाता है कि आज सरकारें कितनी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। यह सब जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tension) और सप्लाई चेन की मजबूती पर बढ़ते फोकस का नतीजा है।
संदेह और खतरे अभी भी मौजूद:
इस नीतिगत बदलाव पर संदेह भी है। कुछ आलोचकों का कहना है कि यह आर्थिक समझ से ज्यादा, अमेरिका और पश्चिमी यूरोप जैसे बड़े शेयरहोल्डर्स की पसंद का नतीजा है। World Bank के पुराने 'नियोलिबरलिज्म' (Neoliberalism) को बढ़ावा देने के इतिहास पर भी सवाल उठते हैं, जिसने कई देशों में आर्थिक असंतुलन पैदा किया।
इंडस्ट्रियल पॉलिसी के अपने जोखिम हैं। यह बड़े कॉर्पोरेट हितों के "स्टेट कैप्चर" (State Capture) का शिकार हो सकती है, जिससे कमजोर कंपनियां फायदा उठा सकती हैं। World Bank खुद मानता है कि विकासशील देश अक्सर "गलती कर बैठते हैं" और "ब्लंट इंस्ट्रूमेंट्स" (blunt instruments) जैसे टैरिफ या सब्सिडी का इस्तेमाल करते हैं, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं और दूसरी अर्थव्यवस्थाएं पलटवार कर सकती हैं।
आगे का रास्ता:
World Bank अब "स्ट्रेटेजिक प्रिसिजन" (Strategic Precision), मजबूत सरकारी संस्थानों और स्थानीय क्षमता के हिसाब से नीतियां बनाने पर जोर दे रहा है। यह ग्लोबल साउथ (Global South) के देशों के लिए एक बड़ा मौका है कि वे अपनी इंडस्ट्रियल स्ट्रेटेजी (Industrial Strategy) को मजबूत करें, खासकर जब विकसित देश अपनी इंडस्ट्रीज को बचा रहे हैं। हालांकि, सफलता अंततः राज्य की क्षमता पर निर्भर करेगी कि वह इन नीतियों को कुशलता से लागू करे।
