वर्ल्ड बैंक का बड़ा ऐलान: RBI की रुपया रणनीति पर मुहर
वर्ल्ड बैंक (World Bank) ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रुपये की विनिमय दर को स्थिर करने की रणनीति बिल्कुल सही है। वर्ल्ड बैंक के भारत के लिए लीड कंट्री इकोनॉमिस्ट, ऑरेलियन क्रूस (Aurélien Kruse) ने कहा कि केंद्रीय बैंक का अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को कम करना, लेकिन किसी खास स्तर को टारगेट न करना, एक समझदारी भरा कदम है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्षों के कारण रुपया दबाव में था और मार्च 2026 में डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निम्न स्तर 95 के पार चला गया था। RBI के हस्तक्षेप के बावजूद, मार्च 2026 में USD/INR एक्सचेंज रेट 99.82 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।
भारत की GDP ग्रोथ बढ़ी, पर चिंताएं बरकरार
वर्ल्ड बैंक ने भारत के मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 30 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 6.6% कर दिया है। इसके पीछे घरेलू मांग में मजबूती और हाल के व्यापारिक समझौतों, जैसे जनवरी 2026 में यूरोपीय संघ (EU) और फरवरी 2026 में अमेरिका के साथ हुए सौदों को वजह बताया गया है। वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि भारत की GDP वित्त वर्ष 2027-28 में 7.2% और वित्त वर्ष 2028-29 में 7% रह सकती है।
हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों को लेकर वर्ल्ड बैंक और RBI के अनुमानों में अंतर है। वर्ल्ड बैंक 2026-27 के लिए कच्चे तेल की कीमत 90-100 डॉलर प्रति बैरल मान रहा है, जबकि RBI का अनुमान 85 डॉलर प्रति बैरल है। साथ ही, वर्ल्ड बैंक खुदरा महंगाई दर 4.9% रहने का अनुमान लगा रहा है, जो RBI के 4.6% के अनुमान से ज्यादा है। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भी तेल आपूर्ति में रुकावटों और रुपये की कमजोरी के कारण पहले 7% रहने वाले ग्रोथ अनुमान को घटाकर 5.9% कर दिया है और महंगाई रोकने के लिए 50 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर वृद्धि की उम्मीद जताई है।
रिकॉर्ड विदेशी निवेश पर भारी बिकवाली, बाजार में गिरावट
इन सकारात्मक अनुमानों के बावजूद, चिंताएं कम नहीं हुई हैं। मार्च 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजारों से रिकॉर्ड 1.14 लाख करोड़ रुपये (12.7 अरब डॉलर) निकाल लिए। यह अब तक का सबसे बड़ा मासिक बहिर्वाह है, जो पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव, कमजोर होते रुपये और ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों का नतीजा है। रुपये की गिरावट ने डॉलर में रिटर्न को कम कर दिया, जिससे उभरते बाजारों की संपत्तियां कम आकर्षक हो गईं। इसी बिकवाली के दबाव के चलते मार्च में निफ्टी (Nifty) और सेंसेक्स (Sensex) जैसे प्रमुख सूचकांकों में 11% की भारी गिरावट आई, जो पिछले 6 सालों में सबसे खराब मासिक प्रदर्शन रहा।
मार्च 2026 में भारत का मार्केट कैपिटलाइजेशन 4.395 ट्रिलियन डॉलर पर आ गया, जो पिछले महीने 5.091 ट्रिलियन डॉलर था। यह पिछले 15 सालों में सबसे बड़ी गिरावट है। 7 अप्रैल, 2026 तक निफ्टी 50 का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो लगभग 20.32 था। जबकि यह ऐतिहासिक औसत के मुकाबले बहुत ज्यादा नहीं है, मैक्रोइकॉनॉमिक अनिश्चितताओं और FPIs की भारी बिकवाली के चलते इस पर दबाव है। तुलनात्मक रूप से, MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स का P/E करीब 14.5 है, जो बताता है कि भारतीय बाजार प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है।
बड़े भू-राजनीतिक जोखिम भी हावी
वर्ल्ड बैंक ने खुद भी ग्रोथ आउटलुक के लिए "भारी" डाउनसाइड जोखिमों को स्वीकार किया है। ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का प्रभावी रूप से बंद होना, जो एक महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर रहा है और ब्रेंट क्रूड की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार ले गया है। यह अस्थिरता भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ता है और महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। हालांकि, हालिया अमेरिकी-ईरान युद्धविराम से कुछ राहत मिली है, लेकिन इसकी अवधि और आपूर्ति में संभावित रुकावटों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
RBI ने संभाला मोर्चा, रुपये को स्थिर करने के लिए उठाए कदम
RBI अपनी विनिमय दर की अस्थिरता को प्रबंधित करने की नीति पर लगातार कायम है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दोहराया कि हस्तक्षेप का उद्देश्य अत्यधिक अस्थिरता को कम करना है, न कि किसी विशेष रुपये के स्तर का बचाव करना। मार्च के अंत में, RBI ने अटकलों पर अंकुश लगाने के लिए उपाय किए, जिसमें बैंकों की नेट ओपन फॉरेन-एक्सचेंज पोजीशन को सीमित करना और फॉरेक्स डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए नियमों को कड़ा करना शामिल है। ये कदम रुपये में आई कमजोरी के दौर के बाद उठाए गए, जो वित्त वर्ष 2026 में डॉलर के मुकाबले लगभग 10% कमजोर हुआ था। हालांकि इन उपायों से हाल के दिनों में कुछ मजबूती आई है, लेकिन FPI आउटफ्लो और भू-राजनीतिक अस्थिरता का दबाव अभी भी मुद्रा की स्थिरता के लिए एक चुनौती बना हुआ है। वर्ल्ड बैंक ने यह भी नोट किया कि भारत ने हालिया संकट में मजबूत बफ़र्स के साथ प्रवेश किया था, जिसमें कम महंगाई और कम चालू खाता घाटा शामिल है, और इसका अधिकांश रुपया-डेनॉमिनेटेड कर्ज स्थिरता के लिए एक सकारात्मक कारक है।
आगे का रास्ता अनिश्चितता भरा
आगे देखते हुए, वर्ल्ड बैंक मध्य पूर्व संघर्ष और ऊंचे वैश्विक ऊर्जा मूल्यों जैसी चुनौतियों के कारण वित्त वर्ष 2027 में भारत की GDP ग्रोथ के 6.6% तक संयमित रहने का अनुमान लगा रहा है। हालांकि EU और अमेरिका के साथ हालिया व्यापार सौदे निर्यात पहुंच में सुधार करके कुछ समर्थन दे सकते हैं, लेकिन प्रमुख व्यापारिक भागीदारों में धीमी वृद्धि इन लाभों को सीमित कर सकती है। भू-राजनीतिक स्थिरता, कमोडिटी की कीमतें, FPI प्रवाह और RBI की नीतियां भारत के आर्थिक पथ और मुद्रा के प्रदर्शन को आकार देंगी।