पिछले एक दशक में रुपया करीब **20%** तक कमजोर हुआ है, लेकिन भारतीय एक्सपोर्ट (Export) की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) में खास सुधार नहीं आया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि करेंसी की गिरती कीमत का फायदा अक्सर डोमेस्टिक इन्फ्लेशन (Domestic Inflation) और ग्लोबल कैपिटल की अस्थिरता (Global Capital Volatility) के चलते कम हो जाता है।
Detailed Coverage
क्या गिरता रुपया एक्सपोर्ट के लिए अच्छा नहीं?
भारतीय निवेशकों और इकोनॉमिस्ट्स (Economists) के लिए, कमजोर रुपया अक्सर एक्सपोर्ट बढ़ाने वाला माना जाता है। लेकिन, हाल के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। पिछले 10 सालों में, भारत के टॉप 40 ट्रेडिंग पार्टनर्स (Trading Partners) के मुकाबले रुपया लगभग 20% तक कमजोर हुआ है। इसके बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारत की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है।
इसका एक मुख्य कारण है रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER)। यह करेंसी की कीमत को महंगाई के अंतर के साथ एडजस्ट (Adjust) करता है। डेटा बताता है कि भारत का REER लगभग स्थिर बना हुआ है। इसका मतलब है कि रुपये के सस्ता होने का फायदा डोमेस्टिक महंगाई की वजह से खत्म हो जाता है।
पॉलिसी और करेंसी के बीच दूरी
साल 2022 में महंगाई को काबू में करने के लिए भारत ने अपनी मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) में बड़े बदलाव किए और ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी की। इन कदमों का मकसद करेंसी को स्थिर करना और कैपिटल फ्लो (Capital Flow) को मैनेज करना था। लेकिन, कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) पर इसका असर लगातार कम रहा। साल 2025 तक, नेट कैपिटल इनफ्लो (Net Capital Inflow) एक दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए। इससे पता चलता है कि डोमेस्टिक इंटरेस्ट रेट (Interest Rate) ग्लोबल निवेशकों की भावनाओं को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाते।
उभरते बाजारों की चुनौतियां
भारत जैसे हालात ब्राजील (Brazil) और साउथ अफ्रीका (South Africa) जैसे कई उभरते बाजारों में भी देखे जा रहे हैं। ब्राजील में, इसी अवधि के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले उसकी करेंसी 43% तक गिर गई। लेकिन, वहां भी डोमेस्टिक महंगाई के कारण रियल एक्सचेंज रेट (Real Exchange Rate) मजबूत हुआ, जिससे एक्सपोर्ट को मिलने वाला संभावित फायदा खत्म हो गया। साल 2022 में 14% तक ब्याज दरें बढ़ाने के बावजूद, ब्राजील से कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflow) नहीं रुका और साल 2025 तक यह और बढ़ गया। साउथ अफ्रीका को भी ऐसी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जहां करेंसी की भारी गिरावट के बावजूद करेंट अकाउंट (Current Account) और फाइनेंशियल अकाउंट (Financial Account) दोनों कमजोर रहे।
कैपिटल की अस्थिरता और निवेशकों पर असर
यह दिखाता है कि ये देश करेंसी के जरिए अपनी इकोनॉमी को बढ़ावा देने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। इसकी वजह ग्लोबल निवेशकों का भरोसा और उनकी सोच है। आजकल की ग्लोबल फाइनेंसियल स्ट्रक्चर (Global Financial Structure) में, कैपिटल फ्लो की अस्थिरता डोमेस्टिक इकोनॉमिक पॉलिसी पर भारी पड़ती है।
निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि कमजोर रुपये से एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों (Export-oriented Companies) के मुनाफे में सीधे बढ़ोतरी की उम्मीद रखना थोड़ा जोखिम भरा हो सकता है। डोमेस्टिक बिजनेस के लिए असली फायदा महंगाई की वजह से कम हो जाता है, जो नॉमिनल एक्सचेंज रेट (Nominal Exchange Rate) से मिलने वाले फायदे को खत्म कर देता है। आने वाले समय में, कैपिटल फ्लो की स्थिरता और देश का बाहरी फाइनेंसिंग (External Financing) पर निर्भर रहना अहम फैक्टर होंगे। ये ही चीजें करेंसी डेप्रिसिएशन (Currency Depreciation) से ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।
