क्यों घटाया अनुमान?
Moody's Ratings का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण ग्लोबल ट्रेड और एनर्जी सप्लाई में आई रुकावटों ने भारत की आर्थिक रफ्तार को धीमा कर दिया है। ऐसे देश जो एनर्जी आयात पर काफी निर्भर हैं, उनके लिए महंगाई और आर्थिक अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई का दबाव
पश्चिम एशिया में तनाव और हॉरमूज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स पर आई रुकावटों की वजह से ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) की कीमतें मार्च 2026 में बढ़कर $94 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। यह साल की शुरुआत के 50% से ज्यादा की बढ़ोतरी है और संघर्ष शुरू होने से पहले $70 से काफी ऊपर है। भारत अपनी जरूरत का करीब 55% तेल और 90% से ज्यादा एलपीजी (LPG) पश्चिम एशिया से आयात करता है, इसलिए इन बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर इंपोर्ट बिल पर पड़ रहा है। एनर्जी की लागत बढ़ने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) यानी खुदरा महंगाई दर FY27 में 4.5% या उससे ऊपर जा सकती है, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टारगेट के लिए चुनौती बन सकती है। इसके अलावा, 31 मार्च 2026 को भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.21 पर पहुंच गया था।
अनिश्चितता के बीच ग्लोबल ग्रोथ का अनुमान
इन सबके बावजूद, यह उम्मीद की जा रही है कि भारत की इकोनॉमी कई अन्य G20 देशों की तुलना में तेज रफ्तार से बढ़ेगी। IMF ने FY27 के लिए 6.4% और विश्व बैंक (World Bank) ने 6.5% ग्रोथ का अनुमान लगाया है। इससे यह साफ है कि भारत एक प्रमुख ग्रोथ इंजन बना रहेगा, भले ही रफ्तार थोड़ी धीमी हो। अन्य ब्रोकरेज फर्मों ने भी अनुमान जारी किए हैं। फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने पहले FY26 के लिए 6.9% का अनुमान जताया था, जबकि गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) 2026 के लिए 6.7% की भविष्यवाणी कर रहा है। ये अलग-अलग अनुमान इस बात पर निर्भर करते हैं कि संघर्ष कब तक चलता है और इसका पूरा असर कितना होता है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (Monetary Policy Committee) अप्रैल की मीटिंग में अपने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने और न्यूट्रल पॉलिसी का रुख बनाए रखने की उम्मीद है, ताकि इकोनॉमी को सहारा देने और महंगाई को कंट्रोल करने के बीच संतुलन बनाया जा सके।
आयात पर निर्भरता का खुलासा
पश्चिम एशिया संकट ने भारत की आयात पर निर्भरता को साफ दिखाया है। तेल के अलावा, देश को फर्टिलाइजर (खाद) की भी काफी जरूरत है, जिसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इससे एग्रीकल्चरल कॉस्ट और फूड प्राइस पर सीधा असर पड़ता है। गल्फ क्षेत्र रेमिटेंस (विदेशों से भेजा गया धन) के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, जो भारत के कुल फॉरेन इनफ्लो का लगभग 38% है और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को फंड करने में मदद करता है। इन क्षेत्रों में नौकरियों या अर्थव्यवस्था पर कोई भी असर इन अहम विदेशी कमाई के लिए सीधा खतरा है, जिससे 2026-27 में CAD जीडीपी के 1-1.5% तक बढ़ सकता है। यह निर्भरता रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे पिछले एनर्जी शॉक की तुलना में ज्यादा गंभीर है।
फिस्कल चुनौतियों से निपटना
ग्लोबल कमोडिटी की ऊंची कीमतें फ्यूल और फर्टिलाइजर पर सरकारी सब्सिडी को बढ़ाने का दबाव डालती हैं। इससे सरकारी खर्च बढ़ सकता है और रेवेन्यू घट सकता है। सरकार जहां 2030-31 तक कर्ज को जीडीपी के 50% तक लाने का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं लगातार ऊंची एनर्जी कीमतों और बढ़ी हुई सब्सिडी से फिस्कल फ्लेक्सिबिलिटी (राजकोषीय लचीलापन) कम हो सकती है और कर्ज कम करने के प्रयासों में देरी हो सकती है। फिच रेटिंग्स ने भारत की 'BBB-' रेटिंग को स्टेबल आउटलुक के साथ बनाए रखा है, जो मजबूत ग्रोथ की संभावनाओं और बाहरी फाइनेंस को दर्शाता है, लेकिन कर्ज का ऊंचा स्तर एक बड़ी चिंता बना हुआ है। भारतीय सामानों पर संभावित अमेरिकी टैरिफ (Tariffs) भी एक्सपोर्ट पर अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं।