ग्रोथ के अनुमान पर गहराए बादल
वित्त मंत्रालय की ओर से जारी आर्थिक समीक्षा (Economic Review) के अनुसार, भारत की आर्थिक विकास दर, जिसके 7.0% से 7.4% के बीच रहने का अनुमान था, अब मज़बूत शुरुआती संकेतों के बावजूद कई चुनौतियों का सामना कर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव इस अनुमान के लिए सबसे बड़ा डाउनसाइड रिस्क (Downside Risk) बनकर उभरा है।
संकट का भारत पर चारतरफा असर
मंत्रालय ने बताया है कि पश्चिम एशिया का संकट भारत की अर्थव्यवस्था को चार मुख्य तरीकों से प्रभावित कर सकता है:
- सप्लाई में रुकावट: तेल (Oil), गैस (Gas) और फर्टिलाइजर (Fertilizer) जैसे ज़रूरी सामानों की सप्लाई चेन (Supply Chain) बाधित हो सकती है।
- इम्पोर्ट (Import) पर बोझ: इम्पोर्ट की कीमतें बढ़ने की आशंका है, साथ ही फ्रेट (Freight) और इंश्योरेंस (Insurance) का खर्च भी बढ़ सकता है।
- एक्सपोर्ट (Export) पर असर: निर्यात (Exports) भी प्रभावित हो सकते हैं।
- रेमिटेंस (Remittances) में कमी: खाड़ी देशों (Gulf Countries) में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले पैसे में कमी आ सकती है।
इन सब वजहों से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) FY27 में और बढ़ सकता है।
ग्लोबल मार्केट और तेल का बढ़ता खतरा
भारत, दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना रहेगा, जहाँ FY27 में GDP ग्रोथ लगभग 7.1% रहने का अनुमान है, जो एडवांस इकोनॉमीज़ (Advanced Economies) के 1.5% के मुकाबले काफी ज़्यादा है। लेकिन, पश्चिम एशिया का संकट इस अनुमान के लिए बड़ा खतरा है। ऐसे ही तेल संकट 1979 और 1990 के दशक की शुरुआत में आए थे, जिनसे महंगाई (Inflation) बढ़ी, भुगतान घाटा (Payment Deficit) गहराया और फॉरेन करेंसी रिजर्व (Foreign Currency Reserves) पर दबाव पड़ा था।
आज, ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार हैं और हॉरमज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे ज़रूरी शिपिंग रूट्स (Shipping Routes) प्रभावित हो रहे हैं, जहां से भारत का बड़ा एनर्जी इम्पोर्ट होता है। हर $10 के कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी से भारत का सालाना इम्पोर्ट बिल $13-15 बिलियन तक बढ़ सकता है।
भारत की कमजोरी और बढ़ता आयात बिल
कच्चे तेल पर भारत की भारी निर्भरता इसकी एक बड़ी कमजोरी है, जो देश को लगातार बढ़ती महंगाई और ट्रेड गैप (Trade Gap) के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके अलावा, फर्टिलाइजर, डायमंड (Diamond) और प्लास्टिक (Plastic) जैसे इम्पोर्ट्स की लागत भी बढ़ सकती है। खाड़ी देशों से रेमिटेंस में कमी आना उन राज्यों के लिए भी चिंता का विषय है जहां के लोग बड़ी संख्या में वहां काम करते हैं।
सुधार (Reforms) ही हैं मज़बूती का रास्ता
मंत्रालय का कहना है कि इन बाहरी दबावों से निपटने का सबसे मज़बूत तरीका स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (Structural Reforms) को तेज़ी से लागू करना है। मैन्युफैक्चरिंग लागत (Manufacturing Costs) को कम करना, लेबर प्रैक्टिस (Labour Practices) में सुधार और नीतिगत स्पष्टता (Policy Clarity) भारत को निवेशकों के लिए और आकर्षक बना सकती है। मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा स्थिति का फायदा उठाकर 'सुधार के प्रयासों को दोगुना करना' एक रणनीतिक ज़रूरत है, जिससे भारत लंबी अवधि में वैश्विक अनिश्चितताओं (Global Uncertainties) का बेहतर ढंग से सामना कर सके।