इन्फ्लेशन का बढ़ता बोझ
ब्लूमबर्ग न्यूज़ (Bloomberg News) के एक ग्लोबल सर्वे में इकोनॉमिस्ट्स ने इस बात पर सहमति जताई है कि ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण दुनिया भर में इन्फ्लेशन (Inflation) यानी महंगाई बढ़ रही है। करीब 40% इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि यूरोजोन में कीमतें पहले से तेज रफ्तार से बढ़ेंगी, जबकि इतनी ही संख्या में एक्सपर्ट्स अमेरिका के लिए भी ऐसी ही आशंका जता रहे हैं। चीन में भी महंगाई में तेजी देखने की उम्मीद है, जहां लगभग 40% लोगों का अनुमान है कि कंज्यूमर प्राइस ग्रोथ पहले के अनुमानों से 0.3% से 0.9% तक तेज हो सकती है।
इस महंगाई के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल (Crude Oil) और नेचुरल गैस की कीमतों में आया जबरदस्त उछाल है। होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से समुद्री यातायात में आई गंभीर रुकावटों के कारण ये कीमतें बढ़ी हैं। दुनिया का करीब एक-पांचवां (1/5th) हिस्सा समुद्री रास्ते से होने वाले तेल की सप्लाई इसी जलडमरूमध्य से गुजरती है। लेकिन तनाव के कारण अब यहां रोजाना केवल कुछ ही टैंकर गुजर रहे हैं, जबकि पहले यह संख्या करीब 60 थी।
सप्लाई चेन पर गहराता खतरा
सिर्फ एनर्जी की कीमतें ही नहीं बढ़ी हैं, बल्कि हवाई किराए (Airfares) और डिलीवरी की लागत (Distribution Costs) में भी इजाफा हुआ है। यह सब मिलकर सप्लाई चेन (Supply Chain) से जुड़े जोखिमों को और बढ़ा रहा है, खासकर अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है। इतिहास गवाह है कि ऐसे संकटों ने कीमतें बढ़ाई हैं और आर्थिक अस्थिरता पैदा की है।
इन बढ़ी हुई चिंताओं के चलते, मार्च 2026 की शुरुआत में ही कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 6-7% का उछाल देखा गया। होरमुज़ जलडमरूमध्य में आई रुकावट के कारण रोजाना 1.1 करोड़ (11 Million) बैरल से ज्यादा क्रूड सप्लाई प्रभावित हो रही है।
ग्रोथ का नाजुक संतुलन
हालांकि, बढ़ी हुई महंगाई के बावजूद, ज्यादातर इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि अमेरिका, यूरोजोन और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर फौरी तौर पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। 2026 के लिए ग्लोबल रियल जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 2.9% से 3.3% के बीच रहने की उम्मीद है। उदाहरण के लिए, गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) रिसर्च का अनुमान है कि ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ 2.9% रहेगी, जो 2.7% के कंसेंसस अनुमान से बेहतर है। चीन और भारत भी इस ग्रोथ में अहम योगदान देंगे।
लंबे संघर्ष का 'बीयर केस'
लेकिन, अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो स्थिति गंभीर हो सकती है। लगातार ऊंची तेल कीमतों से ऊर्जा आयात करने वाले देशों जैसे चीन, यूरोप और भारत पर भारी बोझ पड़ेगा। उदाहरण के लिए, जापान और फिलीपींस अपनी 90% तेल की जरूरत के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर हैं, जबकि चीन और भारत क्रमशः 38% और 46% तेल यहीं से आयात करते हैं।
अगर होरमुज़ जलडमरूमध्य एक महीने के लिए भी बंद रहता है, तो रोजाना 60 करोड़ (600 Million) बैरल तेल की कमी हो सकती है, जिसे दूसरे देश आसानी से पूरा नहीं कर पाएंगे। यूरोपियन सेंट्रल बैंक (European Central Bank) का अनुमान है कि तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी यूरोजोन की जीडीपी ग्रोथ को 0.2% तक घटा सकती है।
ऐतिहासिक तौर पर, ऐसे सैन्य संघर्षों से शेयर बाजारों में तब तक बड़ी गिरावट नहीं आई है, जब तक तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार न जाएं। लेकिन इस बार, अगर तेल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचते हैं या सप्लाई बाधित रहती है, तो यह वैश्विक मंदी (Global Recession) का कारण बन सकता है।
भविष्य की राह: अनिश्चितता
फिलहाल, छोटी-मोटी रुकावटों को अर्थव्यवस्थाएं झेल रही हैं, लेकिन लंबी अवधि का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि तनाव कितना कम होता है और सप्लाई रूट सामान्य होते हैं। जे.पी. मॉर्गन (J.P. Morgan) के विश्लेषकों को उम्मीद है कि 2026 में ग्लोबल कोर इन्फ्लेशन 2.8% पर स्थिर रहेगा, हालांकि अमेरिका और यूरोप में महंगाई के अलग-अलग रुझान दिख सकते हैं। फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) का अनुमान है कि 2026 की दूसरी तिमाही तक महंगाई 2.2% तक आ जाएगी, लेकिन यह अभी ताजा भू-राजनीतिक झटके का पूरा असर नहीं दिखाता।
सेंट्रल बैंकों के लिए यह एक नाजुक दौर है। वे महंगाई बढ़ने के जोखिम को देखते हुए ब्याज दरों में कटौती को लेकर सतर्क रहेंगे।