WTO में अटकी डिजिटल ट्रेड की डील
वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) की मिनिस्ट्रियल कॉन्फ्रेंस में डिजिटल कॉमर्स के अहम मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पाई। खास बात यह है कि 26 साल पुरानी ई-कॉमर्स मोरेटोरियम (e-commerce moratorium) यानी डिजिटल ट्रांसमिशन पर टैक्स न लगाने की डील आगे नहीं बढ़ सकी। यह फेलियर डेवलप्ड और डेवलपिंग देशों के बीच की खाई को और गहरा करता है। अमेरिका इस बैन को परमानेंट करना चाहता था, लेकिन ब्राजील जैसे देशों ने टैक्स रेवेन्यू और पॉलिसी फ्लेक्सिबिलिटी की चिंता जताते हुए इसका विरोध किया। अब दुनिया भर के देश डिजिटल ट्रेड पर पहली बार टैरिफ लगा सकते हैं।
टेक दिग्गजों पर मंडराया खतरा
इन बड़ी टेक कंपनियों का मार्केट कैप भी बहुत बड़ा है। Apple का मार्केट कैप करीब $3.76 ट्रिलियन है, Microsoft का $2.77 ट्रिलियन, Amazon का $2.25 ट्रिलियन, Alphabet का $3.58 ट्रिलियन, और Meta Platforms का $1.45 ट्रिलियन है। इन कंपनियों के P/E रेश्यो भी काफी प्रीमियम हैं: Apple 32.34, Alphabet 27.29, Microsoft 23.11, Amazon 29.35, और Meta का 24.66। WTO की यह विफलता इन कंपनियों के लिए कई खतरे पैदा कर रही है। एकजूट ग्लोबल ट्रेड सिस्टम के कमजोर पड़ने से देशों में डिजिटल सर्विस टैक्स, डेटा स्टोरेज और इंटरनेशनल डेटा मूवमेंट जैसे मुद्दों पर अलग-अलग नियम बन सकते हैं। इस तरह की भिन्नता इन कंपनियों के बिजनेस मॉडल के लिए सीधी चुनौती है और उनके ग्लोबल मार्केट में काम करने की क्षमता को भी बाधित कर सकती है।
ग्लोबल ट्रेड सिस्टम में बदलाव का संकेत
WTO में सहमति न बन पाना यह संकेत देता है कि अब देश एक-दूसरे के साथ छोटे ग्रुप्स में या WTO के बाहर अलग से डील करेंगे। इससे ग्लोबल ट्रेड रूल्स का एक दो-स्तरीय सिस्टम बनने का खतरा है, जो उन देशों के लिए नुकसानदायक हो सकता है जो इन चुनिंदा समझौतों में शामिल नहीं होंगे। अमेरिका और EU जहां मोरेटोरियम जारी रखना चाहते हैं, वहीं अन्य देश अपनी अलग डिजिटल ट्रेड पॉलिसी बना रहे हैं। WTO की डिस्प्यूट रेजोल्यूशन (dispute resolution) सिस्टम के कमजोर पड़ने से यह स्थिति और बिगड़ सकती है। अब ट्रेड डिस्प्यूट्स, खासकर डिजिटल कॉमर्स को लेकर, अंतरराष्ट्रीय कानून के बजाय देशों के आपसी समझौतों से सुलझेंगे, जिससे बिजनेस करने वाली कंपनियों के लिए और भी अनिश्चितता बढ़ेगी।
टेक सेक्टर पर बढ़ी चिंता
WTO के इन नतीजों से बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए कई मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। एक बड़ा डर यह है कि देशों में डिजिटल ट्रेड रूल्स अलग-अलग हो सकते हैं। ई-कॉमर्स मोरेटोरियम खत्म होने से, देश डिजिटल सर्विस टैक्स या अन्य चार्ज लगा सकते हैं, जिसका सीधा असर Meta और Google जैसी कंपनियों की कमाई पर पड़ेगा। अमेरिका द्वारा नेशनल सिक्योरिटी का हवाला देकर ट्रेड डिस्प्यूट्स में लिए गए फैसले, भविष्य में डिजिटल ट्रेड के खिलाफ प्रोटेक्शनिस्ट (protectionist) कदमों के लिए एक मिसाल बन सकते हैं। डेटा लोकलाइजेशन (data localization) की मांगें और सख्त डेटा नियम इन टेक दिग्गजों को अपने काम करने के तरीके बदलने पर मजबूर कर सकते हैं, जिससे लागत बढ़ेगी और ग्लोबल डेटा पूल का इस्तेमाल सीमित हो जाएगा। Microsoft की क्लाउड सर्विसेज (Azure) और Apple की ग्लोबल सप्लाई चेन भी इस प्रोटेक्शनिज्म से प्रभावित हो सकती है। हालांकि, एनालिस्ट्स अभी भी इन स्टॉक्स पर बुलिश हैं, Amazon के लिए $284.33 का टारगेट प्राइस दिया गया है। लेकिन यह सब एक स्थिर ग्लोबल बिजनेस माहौल पर टिका है, जिस पर अब WTO की इस विफलता का साया मंडरा रहा है।
एनालिस्ट्स की नजर टेक सेक्टर पर
एनालिस्ट्स का भरोसा अभी भी प्रमुख टेक कंपनियों पर बना हुआ है। Amazon के लिए 84%, Meta के लिए 91%, Alphabet के लिए 88% और Microsoft व Apple के लिए 67% एनालिस्ट्स 'बाय' रेटिंग दे रहे हैं। ये अनुमान एक फंक्शनल ग्लोबल ट्रेड फ्रेमवर्क की उम्मीद पर आधारित थे। WTO में हुई यह विफलता एक नया रिस्क पैदा करती है जो ग्रोथ को धीमा कर सकती है या कंपनियों को अपनी स्ट्रेटेजी में बड़े बदलाव करने पर मजबूर कर सकती है। यह देखना अहम होगा कि ये टेक दिग्गज बिखरे हुए रेगुलेटरी माहौल में कैसे नेविगेट करते हैं, अलग-अलग डिजिटल टैक्सेशन के अनुसार कैसे ढलते हैं, और जटिल क्रॉस-बॉर्डर डेटा फ्लो रूल्स को कैसे मैनेज करते हैं। छोटे देशों के ग्रुप्स के बीच बढ़ते हुए सौदे और वन-ऑन-वन पावर प्ले का यह ट्रेंड दिखाता है कि कंपनियों को भविष्य में कम अनुमानित ग्लोबल ट्रेड सिस्टम में रिस्क मैनेज करने के लिए और ज्यादा फ्लेक्सिबल और रीजन-स्पेसिफिक स्ट्रेटेजी अपनानी होगी।