मंत्रियों की अहम बैठक
याउंडे, कैमरून में 14वीं मिनिस्टेरियल कॉन्फ्रेंस (MC14) में WTO के मंत्री इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी के सवाल पर एक अहम मोड़ पर हैं। साल 1998 से लागू यह मोरेटोरियम, जो डिजिटल डाउनलोड पर टैक्स लगाने पर रोक लगाता है, 31 मार्च को समाप्त हो रहा है। ऐसे में 166 सदस्य देशों के व्यापार मंत्रियों को यह तय करना है कि इसे बढ़ाया जाए, बदला जाए या फिर समाप्त होने दिया जाए।
भारत और विकासशील देशों की मांग: टैक्स लगना चाहिए
भारत, कई अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर, इस मोरेटोरियम को समाप्त करने पर जोर दे रहा है। उनका तर्क है कि ड्यूटी-फ्री डिजिटल ट्रेड से उन देशों को भारी टैरिफ रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है। अकेले भारत को 2020 में $1.5 बिलियन (करीब ₹12,450 करोड़) का नुकसान हुआ, वहीं थाईलैंड और नाइजीरिया जैसे देशों ने भी अरबों डॉलर के राजस्व का नुकसान बताया है। ये देश अपने डिजिटल सेक्टर को विकसित करने, रोजगार पैदा करने और आर्थिक मजबूती के लिए टैरिफ को ज़रूरी मानते हैं।
अमेरिका-यूरोपियन यूनियन का रुख: ड्यूटी-फ्री ट्रेड के पक्ष में
इसके विपरीत, अमेरिका, EU और अन्य विकसित देश इस मोरेटोरियम को स्थायी बनाने की पैरवी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह नवाचार (innovation) को बढ़ावा देने और दुनिया भर में व्यापार लागत को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) जैसे आलोचकों का मानना है कि इसका मुख्य मकसद बड़ी टेक कंपनियों के टैक्स-फ्री कामकाज को सुरक्षित रखना है, खासकर तब जब डिजिटल इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है। GTRI के अजय श्रीवास्तव ने बताया कि यही विकसित देश अक्सर कृषि आयात पर भारी शुल्क लगाते हैं, लेकिन चाहते हैं कि डिजिटल ट्रेड टैक्स-फ्री रहे।
भारत का डिजिटल रेवेन्यू पर नज़रिया
भारत का मानना है कि मोरेटोरियम को बढ़ाने से डिजिटल खाई और चौड़ी होगी और जैसे-जैसे ज़्यादा बिज़नेस ऑनलाइन होगा, रेवेन्यू का घाटा बढ़ेगा। "इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन" की परिभाषा को लेकर भी मतभेद है, जिससे यह अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या डिजिटल सेवाओं को इसमें शामिल किया गया है। MC14 में लिए गए फैसले वैश्विक डिजिटल टैक्सेशन और टेक कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के संतुलन को आकार देंगे।