ई-कॉमर्स टैरिफ पर गतिरोध
14वें WTO मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में ई-कॉमर्स पर कस्टम ड्यूटी (Customs Duty) को माफ रखने के moratorium को स्थायी बनाने को लेकर ज़ोरदार बहस छिड़ गई है। अमेरिका इस moratorium को स्थायी रूप से बढ़ाने की वकालत कर रहा है, उसका तर्क है कि इससे ट्रेड कॉस्ट कम होगा और इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, भारत और कई विकासशील देश इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि इससे उनके राजस्व (Revenue) को बड़ा नुकसान हो सकता है, जो उनके विकास के लिए बेहद ज़रूरी है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का अनुमान है कि इन गंभीर मतभेदों को देखते हुए, एक अस्थायी समाधान (temporary compromise) निकलने की सबसे अधिक संभावना है, जो शायद दो से चार साल का हो सकता है। लेकिन यह भी निश्चित नहीं है। यह विवाद केवल वित्तीय चिंताओं से कहीं ज़्यादा है; यह डिजिटल ट्रेड से होने वाली कमाई पर नियंत्रण और राष्ट्रीय राजस्व सृजन व डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास के बीच संतुलन बनाने का भी मुद्दा है।
बहुपक्षीयवाद (Plurilateralism) का साया
डिजिटल टैरिफ के अलावा, यह सम्मेलन बहुपक्षीय समझौतों (plurilateral agreements) पर चल रही बहसों का भी केंद्र बिंदु बना हुआ है। चीन द्वारा समर्थित 'इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट' (IFD) pact इस बहस का एक प्रमुख मुद्दा है, जिसको लेकर भारत की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव का कहना है कि ऐसे समझौते, यदि WTO के ढांचे में शामिल होते हैं, तो वे 'ट्रोजन हॉर्स' की तरह काम कर सकते हैं। ये धीरे-धीरे WTO के बहुपक्षीय चरित्र को बदल सकते हैं और विकासशील देशों के हितों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। भारत का मानना है कि ऐसे समझौते विकसित और विकासशील देशों के बीच हितों का संतुलन बिगाड़ सकते हैं और उनकी नीतिगत लचीलापन (policy flexibility) को कम कर सकते हैं। भारत को डर है कि इससे एक ऐसी दो-स्तरीय WTO बन सकती है जिस पर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का दबदबा होगा। अमेरिका, जो IFD का सदस्य नहीं है, फिर भी इसके समावेश का समर्थन कर रहा है, जबकि तुर्की जैसे कुछ देशों ने पहले चिंता व्यक्त की थी, लेकिन अब वे अपना रुख नरम करते दिख रहे हैं, जिससे भारत अकेला पड़ सकता है।
मत्स्य पालन (Fisheries) और रुकावट
मत्स्य पालन सब्सिडी (fisheries subsidies) पर बातचीत भी गतिरोध का शिकार है, जिसमें लगातार बने मतभेद अपेक्षित प्रगति में बाधा डाल रहे हैं। वर्षों की चर्चाओं के बाद, 2022 के 'एग्रीमेंट ऑन फिशरीज़ सब्सिडिज़' (Agreement on Fisheries Subsidies) पर, जो एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय समझौता है, आगे बढ़ने में momentum कम हो गया है। खासकर, अत्यधिक मछली पकड़ने (overfishing) और क्षमता (overcapacity) से निपटने वाले महत्वपूर्ण अनुशासनात्मक नियमों पर सहमति नहीं बन पा रही है।
इस समझौते की 'सनसेट क्लॉज' (sunset clause) नजदीक आ रही है, जिससे इन अनुशासनों को अंतिम रूप देने की तात्कालिकता बढ़ गई है। यदि इन पर सहमति नहीं बनती है, तो यह पूरे ढांचे को कमजोर कर सकता है। कई सदस्य देश इस ढांचे को पूरा करने के पक्ष में हैं, लेकिन सब्सिडी की सीमाएं, विकासशील देशों के लिए विशेष और विभेदक उपचार (special and differential treatment), और प्रवर्तन तंत्र (enforcement mechanisms) जैसे मुद्दों पर असहमति बनी हुई है।
बहुपक्षीयवाद का बिखराव (Fracturing Multilateralism)
डिजिटल व्यापार, बहुपक्षीय प्रणाली के भीतर समझौतों की प्रकृति और पर्यावरणीय सब्सिडी जैसे इन गहरे विवादों का संगम, WTO की वर्तमान नाजुक स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यह संगठन एक 'स्ट्रक्चरल क्राइसिस' का सामना कर रहा है, जहाँ सर्वसम्मति (consensus) के सिद्धांत का उपयोग कुछ प्रतिनिधिमंडल प्रगति को रोकने के लिए कर रहे हैं।
इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित हो रही है और तेजी से विकसित हो रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने की WTO की क्षमता कमज़ोर पड़ रही है। अमेरिका द्वारा अपीलीय निकाय (Appellate Body) में नियुक्तियों को अवरुद्ध करने के कारण विवाद निपटान प्रणाली (dispute settlement system) का पंगु होना, इसके प्रवर्तन क्षमताओं को और भी अधिक अक्षम बना रहा है, जिससे विकासशील देश एकतरफा व्यापार उपायों (unilateral trade measures) के प्रति विशेष रूप से असुरक्षित हो गए हैं।
अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता (geopolitical rivalries) इन तनावों को और बढ़ा रही है, जिससे देश द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्थाओं की ओर बढ़ रहे हैं। यह नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली को खंडित (fragment) कर सकता है और WTO की प्रासंगिकता (relevance) को कम कर सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों जैसे गैर-आर्थिक उद्देश्यों (non-economic objectives) का उदय व्यापार एजेंडे को और जटिल बना रहा है, जिसके लिए ऐसे अनुकूलन की आवश्यकता है जिनसे वर्तमान कठोर संरचना जूझ रही है।
भविष्य की राह
याओन्डे (Yaoundé) में MC14 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होने वाला है, जो यह तय करेगा कि WTO समझौते और अनुकूलन (adaptation) की दिशा में एक रास्ता खोज पाती है या गहरे मतभेद सामने आते हैं जिससे इसकी प्रासंगिकता धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। संभावना यही है कि इस सम्मेलन में मुख्य वार्तालाप क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलताओं के बजाय प्रक्रियात्मक निर्णय (procedural decisions), मौजूदा व्यवस्थाओं का विस्तार और नई चर्चाओं पर ज़ोर दिया जाएगा।
विकासशील देशों के लिए, MC14 में सफलता महत्वपूर्ण है ताकि वे अपनी नीतिगत जगह (policy space) को सुरक्षित रख सकें, विकास प्राथमिकताओं को सुनिश्चित कर सकें, और तेजी से शक्ति-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार परिदृश्य में अपनी पकड़ बनाए रख सकें। असफलता का मतलब डिजिटल बहिष्करण, कृषि क्षरण और वैश्विक आर्थिक शासन (global economic governance) में उनकी आवाज़ का क्षरण हो सकता है।