WTO की रिपोर्ट: भारत के सर्विस सेक्टर में बूम, पर मैन्युफैक्चरिंग पीछे!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
WTO की रिपोर्ट: भारत के सर्विस सेक्टर में बूम, पर मैन्युफैक्चरिंग पीछे!

वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) की हालिया रिपोर्ट भारत के ट्रेड सेक्टर के दोहरे चेहरे को उजागर करती है। जहाँ एक ओर भारत का सर्विस सेक्टर ग्लोबल मार्केट में तगड़ा प्रदर्शन कर रहा है, वहीं दूसरी ओर गुड्स एक्सपोर्ट (Merchandise Exports) में पिछड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग में इंपोर्टेड कंपोनेंट्स का कम इस्तेमाल गुड्स एक्सपोर्ट के लिए एक बड़ी रुकावट बन रहा है।

Detailed Coverage

सर्विस सेक्टर में भारत का दबदबा

भारत का सर्विस सेक्टर बाहरी व्यापार का मुख्य आधार बना हुआ है। 2024-25 फाइनेंशियल ईयर में इस सेक्टर से एक्सपोर्ट लगभग $387.6 बिलियन तक पहुँच गया। इसमें टेलीकम्युनिकेशंस, कंप्यूटर और इन्फॉर्मेशन सर्विसेज का बड़ा योगदान है, जहाँ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्टर बन गया है। इन सर्विसेज से $183.3 बिलियन का राजस्व आया, जिसका श्रेय डिजिटल मॉडल को जाता है जो लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतों से बचता है।

गुड्स एक्सपोर्ट में धीमी रफ्तार

इसके विपरीत, गुड्स एक्सपोर्ट में धीमी प्रगति देखी गई है। 2021-22 से 2024-25 के बीच, यह $422 बिलियन से बढ़कर केवल $437.7 बिलियन हुआ, जो सालाना 1.2% की मामूली वृद्धि दर्शाता है। इसके चलते $283.5 बिलियन का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) पैदा हुआ है। मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग और जेनेरिक फार्मास्युटिकल्स जैसे कुछ सेक्टर्स में सफलता मिली है, लेकिन ये भारत के ग्लोबल मर्चेंडाइज ट्रेड शेयर को 1.8% से ऊपर उठाने में कामयाब नहीं हुए हैं।

मैन्युफैक्चरिंग कंपीटिटिवनेस की चुनौतियाँ

WTO की रिपोर्ट का एक अहम निष्कर्ष यह है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स ग्लोबल सप्लाई चेन में ठीक से जुड़ नहीं पा रहे हैं। 2022 के एक वर्ल्ड बैंक स्टडी के अनुसार, केवल 6% भारतीय मैन्युफैक्चरिंग फर्म्स ही इंपोर्टेड कच्चे माल या इंटरमीडिएट सप्लाई का इस्तेमाल करती हैं। यह दर दूसरे क्षेत्रीय देशों की तुलना में काफी कम है। रिपोर्ट में हाई इंपोर्ट टैरिफ (Import Tariffs) को एक बड़ी बाधा बताया गया है, जिससे प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ जाती है और भारतीय उत्पादों के लिए इंटरनेशनल मार्केट में कॉम्पिटिशन करना मुश्किल हो जाता है।

निवेशकों के लिए क्या है मायने?

सरकार ने 2047 तक ग्लोबल मर्चेंडाइज ट्रेड में 10% शेयर हासिल करने का बड़ा लक्ष्य रखा है। इसे पाने के लिए, एक्सपर्ट्स का मानना है कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की कंपीटिटिवनेस बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। इसके लिए इंपोर्टेड टेक्नोलॉजी और कंपोनेंट्स की लागत कम करने वाली पॉलिसी पर काम करना पड़ सकता है, ताकि मैन्युफैक्चरर्स अपनी प्रोडक्शन एफिशिएंसी बढ़ा सकें। निवेशकों के लिए, टैरिफ और हाई-क्वालिटी कंपोनेंट्स के इंपोर्ट की आसानी से जुड़ी ट्रेड पॉलिसी में होने वाले बदलावों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि ये सीधे तौर पर भारतीय मैन्युफैक्चरिंग फर्म्स के प्रॉफिट मार्जिन और ग्लोबल कंपीटिटिवनेस को प्रभावित करते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.