WTO में बड़ा गतिरोध: ग्लोबल ट्रेड का भविष्य अधर में, देशों के बीच बढ़ी दरार

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
WTO में बड़ा गतिरोध: ग्लोबल ट्रेड का भविष्य अधर में, देशों के बीच बढ़ी दरार
Overview

विश्व व्यापार संगठन (WTO) की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC-14) में बड़ा गतिरोध देखने को मिला है। खास तौर पर ऑनलाइन बिक्री पर लगने वाले टैक्स (digital sales duties) और बौद्धिक संपदा अधिकारों (intellectual property rights) से जुड़े नियमों पर सदस्य देशों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में ग्लोबल ट्रेड को लेकर बड़े समझौतों के बजाय देशों के छोटे-छोटे समूह आपस में करार कर सकते हैं।

Instant Stock Alerts on WhatsApp

Used by 10,000+ active investors

1

Add Stocks

Select the stocks you want to track in real time.

2

Get Alerts on WhatsApp

Receive instant updates directly to WhatsApp.

  • Quarterly Results
  • Concall Announcements
  • New Orders & Big Deals
  • Capex Announcements
  • Bulk Deals
  • And much more

यह गतिरोध (deadlock) विश्व व्यापार संगठन (WTO) के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC-14), जो 26 से 29 मार्च 2026 तक चली, में सदस्य देश आम सहमति पर पहुंचने में नाकाम रहे, जिससे अब छोटे देशों के समूह आपस में व्यापारिक करार (plurilateral deals) करने की ओर बढ़ सकते हैं। यह WTO के उस सिद्धांत को कमजोर कर सकता है जिसमें सभी सदस्य देशों की बराबर भागीदारी होती है।

इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन (electronic transmissions) पर कस्टम ड्यूटी (customs duties) लगाने पर लगी रोक, जो 28 साल से लागू थी, का रिन्यू न होना और TRIPS समझौते के तहत 'नॉन-वायलेशन' (non-violation) शिकायतों पर रोक का खत्म होना, सदस्य देशों की बदलती प्राथमिकताओं को दिखाता है। यह स्थिति वैश्विक व्यापार को सार्वभौमिक नियमों (universal rules) से हटकर, केवल इच्छुक देशों के समूह द्वारा संचालित करने की दिशा में ले जा सकती है।

डिजिटल बिक्री (digital sales) पर टैक्स लगाने को लेकर छिड़ा विवाद सदस्य देशों के बीच गहरी खाई दिखाता है। इस पर रोक को बढ़ाने के लिए व्यापक समर्थन के बावजूद, ब्राजील और तुर्किये जैसे देशों के विरोध ने एकमत निर्णय को रोका। इसके जवाब में, 66 WTO सदस्य देशों, जो दुनिया के करीब 70% व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं, ने एक 'इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स पर समझौते' (Agreement on Electronic Commerce - AEC) के तहत अस्थायी व्यवस्था (temporary arrangements) अपनाई है। उनका लक्ष्य अपने बीच इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कोई शुल्क न लगाने के लिए नियम बनाना है। अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और जापान जैसे देशों का समर्थन प्राप्त यह कदम डिजिटल अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने की कोशिश है, लेकिन इसके लिए सार्वभौमिक WTO सहमति की जरूरत नहीं होगी।

इसी बीच, TRIPS समझौते के तहत 'नॉन-वायलेशन' और 'सिचुएशन' शिकायतों पर लगी रोक भी खत्म हो गई है। यह विकासशील देशों (developing countries) के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि वे इस सुरक्षा कवच का इस्तेमाल जेनेरिक दवाओं (generic medicines) जैसी जरूरी चीजों के उत्पादन में लचीलापन (flexibilities) लाने के लिए करते थे। अमेरिका ने इस रोक को खत्म करने पर जोर दिया था, जबकि भारत जैसे विकासशील देश इसका कड़ा विरोध करते हैं।

भारत ने चीन समर्थित 'निवेश सुविधा समझौते' (Investment Facilitation for Development - IFD Agreement) का भी कड़ा विरोध किया। नई दिल्ली का मानना है कि ऐसे समझौते WTO की मुख्य भूमिका को कमजोर कर सकते हैं और देशों के अपनी नीतियां बनाने के अधिकार को छीन सकते हैं। यह चिंताएं इस ओर इशारा करती हैं कि कहीं देशों के छोटे समूह वैश्विक निवेश नियमों को अपनी मर्जी से तो नहीं तय करने लगेंगे, वो भी बिना आम सहमति के।

WTO की संस्थागत ताकत (institutional strength) भी इन समझौतों और सत्ता के बदलते समीकरणों से प्रभावित हो रही है। कुछ आलोचकों का कहना है कि AEC के लिए अपनाई गई अस्थायी व्यवस्थाएं WTO की महानिदेशक (DG) को मौजूदा नियमों से परे जाकर अधिकार दे सकती हैं। हालांकि, महानिदेशक के पास नीतियां बनाने के बजाय प्रबंधन (managerial) के अधिकार होते हैं, फिर भी उनका सदस्यों को एक साथ लाने और सहमति बनाने में महत्वपूर्ण प्रभाव होता है।

अमेरिका का इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स ड्यूटी पर स्थायी रोक की मांग के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में टैरिफ (tariffs) को बढ़ावा देना, व्यापारिक सिद्धांतों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है। TRIPS नॉन-वायलेशन रोक का खत्म होना कई अनिश्चितताएं पैदा कर रहा है। इससे विकासशील देशों को उन स्वीकृत नीतिगत विकल्पों का उपयोग करने के लिए कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, जो दवाओं और कृषि तकनीक तक उनकी पहुंच को प्रभावित कर सकता है।

छोटे समूहों के बीच समझौते (plurilateralism) की ओर बढ़ना वैश्विक व्यापार व्यवस्था को खंडित (fragmented) कर सकता है, जहां नियम छोटे समूहों द्वारा तय होंगे और शायद बाकी सदस्य देशों की विकास संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा।

अब सबकी निगाहें 6 मई से 7 मई को होने वाली WTO जनरल काउंसिल की बैठक पर हैं। इस बैठक का एजेंडा (agenda) काफी हल्का है, जो सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेदों को दर्शाता है। यह देखना होगा कि क्या विकसित देश अपने लक्ष्यों में नरमी लाएंगे और क्या वैश्विक सहमति पर फिर से ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा, या WTO अपनी बिखरी हुई राह पर आगे बढ़ता रहेगा।

Get stock alerts instantly on WhatsApp

Quarterly results, bulk deals, concall updates and major announcements delivered in real time.

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.