वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की एक रिपोर्ट ने दुनिया भर में बढ़ती हाउसिंग कॉस्ट (Housing Cost) को लेकर बड़ी चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 21 देशों में आम लोगों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा घर के किराए या EMI में जा रहा है, जो कि अफोर्डेबल लिमिट (Affordable Limit) से कहीं ज्यादा है। यह संकट 2040 तक बना रह सकता है, जिससे लोगों की बचत और सेहत पर बुरा असर पड़ने की आशंका है।
क्यों गहरा रहा है हाउसिंग संकट?
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने अपनी नई रिपोर्ट में ग्लोबल फाइनेंशियल स्टेबिलिटी (Global Financial Stability) के लिए एक बड़े खतरे की ओर इशारा किया है - हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी क्राइसिस (Housing Affordability Crisis)। रिपोर्ट साफ करती है कि यह कोई छोटा-मोटा मार्केट का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक ऐसी स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम (Structural Problem) है जो साल 2040 तक जारी रह सकती है। स्टडी किए गए 21 में से 20 देशों में लोग अपनी मंथली इनकम का 33% से ज्यादा, जो कि घर के लिए अफोर्डेबल (Affordable) माने जाने की ऊपरी सीमा है, खर्च कर रहे हैं।
भारत समेत कई देशों में हालात गंभीर
कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं, जिनमें भारत, नाइजीरिया और कोलंबिया जैसे देश शामिल हैं, वहां तो हालात और भी चिंताजनक हैं। इन देशों में लोगों को अपनी कुल कमाई का लगभग पूरा हिस्सा यानी 100% तक घर के खर्चों में लगाना पड़ रहा है। एक और हैरान करने वाली बात यह है कि जिन देशों में पिछले 10 सालों में प्रॉपर्टी की कीमतें सैलरी के मुकाबले गिरी भी हैं (जैसे भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया में 15% से ज्यादा गिरावट), वहां भी लोगों को अफोर्डेबिलिटी (Affordability) के मोर्चे पर कोई राहत नहीं मिली है। इससे साफ है कि सिर्फ कीमतों के गिरने से यह मसला हल नहीं हो रहा।
जनरेशन गैप और आर्थिक बोझ
जनरेशनल शिफ्ट (Generational Shift) भी इस संकट को और बढ़ा रहा है। 2025 से 2040 के बीच, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में बुजुर्गों की आबादी का अनुपात बढ़ेगा। ऐसे में, युवा वर्कर्स पर एक साथ तीनहरी मार पड़ेगी - उन्हें घर का किराया/EMI, अपनी रिटायरमेंट सेविंग्स (Retirement Savings) और साथ ही कई पीढ़ियों का खर्च उठाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। इस 'ट्रिपल प्रेशर' (Triple Pressure) का असर उनकी वेल्थ एक्युमुलेशन (Wealth Accumulation) पर लंबे समय तक दिखेगा।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
इन्वेस्टर्स (Investors) के लिए यह समझना जरूरी है कि हाउसिंग का यह दबाव लोगों के खर्च करने के तरीके और इकोनॉमिक स्टेबिलिटी (Economic Stability) को कैसे प्रभावित करेगा। WEF की चेतावनी है कि ज़्यादा हाउसिंग कॉस्ट (Housing Cost) लोगों को रहने के लिए खराब हालातों में रहने को मजबूर करती है, जिससे मेडिकल खर्च बढ़ सकते हैं और विवेकाधीन खर्च (Discretionary Spending) कम हो सकता है। इसके अलावा, लगातार आर्थिक तनाव के चलते युवा अपनी घटती आय को बढ़ाने के लिए हाई-रिस्क फाइनेंशियल एक्टिविटीज (High-Risk Financial Activities) की ओर बढ़ सकते हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2015 से OECD देशों में युवा वयस्कों का अपने माता-पिता के साथ रहने का चलन बढ़ा है, जो हाउसिंग की अफोर्डेबिलिटी (Affordability) की समस्या के चलते और बढ़ सकता है।
आगे की राह
अगर नए, इंटर-जेनरेशनल हाउसिंग मॉडल्स (Inter-generational Housing Models) नहीं अपनाए गए, तो वर्तमान हालात व्यक्तिगत संपत्ति (Individual Wealth) को कम करते रहेंगे। रियल एस्टेट (Real Estate) और फाइनेंशियल सेक्टर (Financial Sector) में भविष्य की चर्चाएं पॉलिसी इंटरवेंशन्स (Policy Interventions), इनोवेटिव फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर्स (Innovative Financing Structures) और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (Public-Private Partnerships) पर केंद्रित होंगी, ताकि अफोर्डेबिलिटी गैप (Affordability Gap) को भरा जा सके। भारतीय मार्केट के लिए, अफोर्डेबल हाउसिंग इनिशिएटिव्स (Affordable Housing Initiatives) और पहली बार घर खरीदने वालों के लिए क्रेडिट उपलब्धता (Credit Availability) से जुड़े पॉलिसी बदलावों पर नज़र रखना अहम होगा, ताकि इन स्ट्रक्चरल प्रेशर (Structural Pressure) को कम किया जा सके।
