यूएस यील्ड्स के उछाल से ग्लोबल मार्केट में मची खलबली
दुनिया भर के शेयर बाजार इन दिनों भारी बिकवाली का सामना कर रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स (US Treasury Yields) में आई तूफानी तेजी है। 30-साल की यील्ड ने तो 5.197% का आंकड़ा पार कर लिया, जो कि 2007 के मध्य के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। लगातार बनी हुई महंगाई (Inflation) की चिंताओं ने इस उछाल को और हवा दी है। बॉन्ड यील्ड्स में इस तेज बढ़ोतरी ने बॉन्ड्स में भारी बिकवाली को जन्म दिया है और दुनियाभर के स्टॉक की कीमतों पर भारी दबाव डाला है।
एशियाई इक्विटीज़ में भारी गिरावट
एशियाई शेयर बाजार भी इस ग्लोबल निराशावाद को दर्शा रहे हैं। जापान का निक्केई 225 (Nikkei 225) 0.88% टूट गया, जबकि ब्रॉडर टोपिक्स इंडेक्स (Topix index) 0.75% नीचे आया। दक्षिण कोरिया के कोस्पी (Kospi) में 0.52% की गिरावट आई, वहीं टेक-सेवी कोस्डैक (Kosdaq) 2.15% लुढ़क गया। ऑस्ट्रेलिया का S&P/ASX 200 भी 0.5% की गिरावट के साथ बंद हुआ। हांगकांग के हैंग सेंग इंडेक्स (Hang Seng index) के फ्यूचर्स भी गिरावट का संकेत दे रहे हैं।
भारतीय बाजार में भी कमजोर शुरुआत के आसार
भारतीय शेयर बाजार भी इस ट्रेडिंग सेशन की शुरुआत में मुश्किलों का सामना करने की उम्मीद कर रहे हैं। भारत के निफ्टी 50 (Nifty 50) के लिए एक ऑफशोर इंडिकेटर, गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty), 23,467.50 पर नीचे कारोबार कर रहा था, जो भारतीय बेंचमार्क के लिए एक बड़ी गैप-डाउन ओपनिंग का संकेत दे रहा है। पिछली क्लोजिंग में, भारत के मुख्य सूचकांक, निफ्टी और सेंसेक्स (Sensex), मामूली नुकसान के साथ क्रमशः 23,618 और 75,200.85 पर बंद हुए थे, जो सीमित ट्रेडिंग रेंज के बाद हुए थे।
मार्केट आउटलुक और निवेशकों की सोच
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स में यह तेज बढ़ोतरी, खासकर 30-साल की दर में, लगातार महंगाई या फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की थोड़ी सख्त नीति की चिंताओं को उजागर करती है। ऊंची यील्ड्स वैश्विक उधार लागत को बढ़ाती हैं, जिससे इक्विटी निवेश सुरक्षित फिक्स्ड-इनकम निवेशों की तुलना में कम आकर्षक हो जाता है। निवेशक अपने पोर्टफोलियो का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं, और आगे बाजार में और ज्यादा अस्थिरता की उम्मीदों के बीच जोखिम कम करने का लक्ष्य बना रहे हैं। मौजूदा बाजार की भावना एक स्पष्ट 'रिस्क-ऑफ' (Risk-off) दृष्टिकोण की ओर इशारा करती है, जो तब तक जारी रह सकती है जब तक महंगाई के रुझानों और केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आती। एशियाई बाजारों पर यह दबाव, जिसमें भारत का गिफ्ट निफ्टी भी शामिल है, दिखाता है कि कैसे वैश्विक आर्थिक बदलाव सीधे क्षेत्रीय ट्रेडिंग सेंटिमेंट को प्रभावित करते हैं। भारत में पिछली क्लोजिंग में कमजोर मोमेंटम यह बताता है कि मौजूदा घरेलू कमजोरियां अंतरराष्ट्रीय आर्थिक दबावों से और बढ़ रही हैं।
