वैश्विक बाजारों में हलचल
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, खासकर 10-साल के बॉन्ड यील्ड का 4.6% से ऊपर जाना, दुनिया भर के बाजारों में अस्थिरता पैदा कर रहा है। इसकी मुख्य वजह हैं अमेरिका में महंगाई का लगातार बना रहना, पश्चिम एशिया में तनाव के चलते कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अमेरिकी फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) के बढ़ने के अनुमान। इन सबने मिलकर वैश्विक वित्तीय स्थितियों को टाइट कर दिया है, जिससे निवेशक अब यह मानकर चल रहे हैं कि अमेरिका का फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है।
तेल की कीमतें और महंगाई का डर
ब्रेंट क्रूड (Brent crude) का भाव $109 प्रति बैरल के पार जाना एक बड़ा कारण बन गया है। इससे यह डर बढ़ गया है कि मध्य पूर्व के संघर्ष ऊर्जा की कीमतों को और बढ़ा सकते हैं। महंगाई का यह दबाव एक मुख्य वजह है जिसके चलते निवेशकों को लग रहा है कि फेडरल रिजर्व अपनी मौजूदा ब्याज दर नीति को लंबे समय तक बनाए रख सकता है। अमेरिका के फिस्कल हेल्थ को लेकर चिंताएं, जिन्हें पिछले साल मूडीज (Moody's) द्वारा रेटिंग घटाए जाने से बल मिला था, भी निवेशकों को सतर्क कर रही हैं। ऐसे में, वे अमेरिकी कर्ज पर ऊंचे रिटर्न की मांग कर सकते हैं।
भारतीय बाजारों पर असर
इस वैश्विक उथल-पुथल का असर भारत पर भी साफ दिख रहा है। भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने रिकॉर्ड निचले स्तर को तोड़ता हुआ 97 रुपये प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया है। ऐसे में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को आक्रामक डॉलर बिक्री के जरिए अपना हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ा है। इस हस्तक्षेप से बाजार से निकलने वाले पैसे (liquidity drain) की भरपाई करने और बैंकिंग सिस्टम को स्थिर रखने के लिए, RBI ने $5 अरब की डॉलर/रुपया बाय-सेल स्वैप (swap) नीलामी की घोषणा की है, जिसकी अवधि तीन साल की होगी। बैंकरों का मानना है कि इससे करेंसी मार्केट में बढ़े हुए फॉरवर्ड प्रीमियम को भी नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
10-साल की यील्ड का महत्व
भारत (G-sec) और अमेरिका (Treasury) दोनों में 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड का महत्व फिर से बढ़ गया है। यह यील्ड महंगाई, सरकारी उधार, आर्थिक विकास, लिक्विडिटी और भविष्य की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर बाजार की उम्मीदों का एक अहम संकेतक है। भारतीय और अमेरिकी यील्ड के बीच का अंतर (spread) वैश्विक निवेशकों द्वारा विभिन्न बाजारों में जोखिम-समायोजित रिटर्न की तुलना करने के लिए बारीकी से देखा जाता है। यह अंतर बढ़ने से भारतीय बॉन्ड में विदेशी निवेश कम हो सकता है और RBI के लिए मॉनेटरी पॉलिसी के फैसले लेना जटिल हो सकता है, हालांकि घरेलू कारक अभी भी मुख्य चालक बने हुए हैं।
विदेशी निवेशकों का बढ़ता प्रभाव
आने वाले समय में भारत के प्रमुख ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स, जैसे कि जून 2024 से शुरू होने वाले जेपी मॉर्गन (JPMorgan) के इमर्जिंग-मार्केट इंडेक्स में शामिल होने से, 10-साल के बॉन्ड यील्ड का महत्व और भी बढ़ जाएगा। इस जुड़ाव से भारी मात्रा में पैसिव विदेशी निवेश आने की उम्मीद है, जिससे भारतीय बॉन्ड बाजार वैश्विक वित्तीय स्थितियों के साथ और अधिक एकीकृत हो जाएगा। विदेशी निवेशक अब भारत-अमेरिका यील्ड स्प्रेड, रुपये की स्थिरता, महंगाई के रुझान और RBI की नीतिगत दिशा पर अधिक ध्यान केंद्रित करेंगे।
