डिजिटल टैक्स पर अमेरिका का जोर
व्हाइट हाउस की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका इस बात पर अड़ गया है कि भारत अपने डिजिटल सर्विसेज टैक्स (DST) को खत्म करे और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से होने वाले व्यापार पर कस्टम ड्यूटी (Customs Duty) लगाने की प्रथा पर हमेशा के लिए रोक लगा दे। इस मांग को अंतिम व्यापार समझौते (Final Trade Agreement) का हिस्सा बनाने का दबाव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मांग भारत की अपनी डिजिटल अर्थव्यवस्था (Digital Economy) को बढ़ावा देने की क्षमता पर सीधा असर डाल सकती है। भारत अब तक विश्व व्यापार संगठन (WTO) के उस नियम का समर्थन करने से कतराता रहा है जो इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर लगने वाली ड्यूटी पर स्थायी रोक लगाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस पर ड्यूटी न लगाने से भारत को सालाना लगभग 50 करोड़ डॉलर का राजस्व (Revenue) गंवाना पड़ सकता है। उद्योग विश्लेषक चिंता जता चुके हैं कि अमेरिका के दबाव में भारत पहले ही डिजिटल सर्विसेज टैक्स पर झुक चुका है और भविष्य में ऐसी कोई भी प्रतिबद्धता देश के स्थानीय डिजिटल प्लेयर्स के लिए नुकसानदेह हो सकती है।
एनर्जी चॉइस भी बनी डील का हिस्सा
सिर्फ डिजिटल ही नहीं, अमेरिका ने भारत की एनर्जी पॉलिसी (Energy Policy) को भी अपनी शर्तों से जोड़ दिया है। हाल ही में भारत के सामानों पर लगी 25% अतिरिक्त टैरिफ (Additional Tariff) में जो ढील दी गई है, वह इस शर्त पर है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे। यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को बातचीत की मेज पर ले आया है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने जोर देकर कहा है कि भारत अपनी ऊर्जा खरीद के फैसले राष्ट्रीय हित, विविधीकरण (Diversification) और किफायती दाम के आधार पर लेता है, न कि किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता के कारण। हालांकि, अमेरिका की यह मांग भारत की अपनी ऊर्जा रणनीति तय करने की स्वायत्तता (Autonomy) को सीमित करती दिख रही है।
क्यों जरूरी है भारत के लिए डिजिटल स्पेस?
यह पूरा मामला भारत की डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) से जुड़ा है। अमेरिका का डिजिटल इकोनॉमी को लेकर रवैया डेटा के मुक्त प्रवाह (Free Flow of Data) और डेटा लोकलाइजेशन (Data Localization) की अनिवार्यता को कम करने का रहा है। यह उस दिशा के विपरीत है जहाँ भारत जैसे विकासशील देश अपनी घरेलू इंडस्ट्री को सहारा देने और डेटा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अपनी नीतियां बनाना चाहते हैं।
भारत की डिजिटल इकॉनमी 2026 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) और जटिल नियमों जैसी चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। ऐसे में, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर ड्यूटी पर रोक लगाने से उभरती हुई डिजिटल सेवाओं, खासकर AI-संचालित सेवाओं से मिलने वाले संभावित टैक्स बेस (Tax Base) को नुकसान हो सकता है।
क्या हैं इसके गंभीर परिणाम?
अगर भारत अमेरिका की इन मांगों को मानता है, तो इसका सीधा असर उसकी डिजिटल संप्रभुता पर पड़ेगा। विदेशी टेक कंपनियां भारत के डिजिटल बाजार पर हावी हो सकती हैं, और उनका टैक्स में योगदान बहुत कम रह सकता है। यह उन देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों जैसा हो सकता है जहाँ सरकारों की डेटा लोकलाइजेशन या सोर्स कोड एक्सेस (Source Code Access) जैसी नीतियां तय करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
इससे भारत की अपनी टेक स्टार्टअप्स (Tech Startups) और बड़ी कंपनियों के विकास में बाधा आ सकती है, जिन्हें पनपने के लिए नीतिगत समर्थन और प्रतिस्पर्धी टैक्स संरचनाओं की जरूरत है। रूस से तेल न खरीदने का दबाव, भले ही प्रतिबंधों के अनुपालन के नाम पर हो, भारत की स्वतंत्र रूप से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की क्षमता पर भी सवाल खड़ा करता है।
आगे क्या?
भारत की डिजिटल इकॉनमी भविष्य में तेजी से बढ़ने वाली है, जिसके 2029-30 तक राष्ट्रीय आय का लगभग पांचवां हिस्सा बनने की उम्मीद है। लेकिन वैश्विक आर्थिक महाशक्तियों के दबाव में, भारत अपने व्यापारिक समझौते कैसे तय करता है, यह तय करेगा कि यह वृद्धि देश के लिए कितना फायदेमंद साबित होती है। भारत के सामने एक नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती है – व्यापार उदारीकरण (Trade Liberalization) और विदेशी निवेश के फायदे उठाने के साथ-साथ अपनी वित्तीय स्वतंत्रता (Fiscal Space), नियामक स्वायत्तता (Regulatory Autonomy) और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को सुरक्षित रखना। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भविष्य में भारत की तकनीकी प्रगति उन रियायतों का शिकार बन सकती है जो वह इन महत्वपूर्ण व्यापार वार्ताओं के दौरान दे सकता है।