क्यों बढ़ा अमेरिका का ट्रेड डेफिसिट?
दिसंबर 2025 में अमेरिका का गुड्स (Goods) और सर्विसेज (Services) ट्रेड डेफिसिट पिछले महीने की तुलना में 32.6% बढ़कर $70.3 बिलियन हो गया, जो कि $55.5 बिलियन के अनुमान से काफी ज्यादा है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से इम्पोर्ट्स में 3.6% की बढ़त के कारण हुई, जो $357.6 बिलियन पर पहुंच गए। वहीं, एक्सपोर्ट्स 1.7% घटकर $287.3 बिलियन पर आ गए। साल 2025 के लिए पूरा एनुअल डेफिसिट (Annual Deficit) $901.5 बिलियन रहा, जो पिछले साल से मामूली 0.2% कम है, लेकिन 1960 के बाद तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है।
टैरिफ नीतियों का असर और देशों के साथ बदला व्यापार संतुलन
साल भर चलीं टैरिफ नीतियों ने देशों के बीच व्यापार में बड़े बदलाव लाए। चीन के साथ अमेरिका का ट्रेड डेफिसिट लगभग 32% घटकर $202 बिलियन रह गया, जो दो दशक से भी ज्यादा समय का सबसे निचला स्तर है। यह बढ़ी हुई टैरिफ और ट्रेड टेंशन का सीधा नतीजा था। वहीं, ताइवान के साथ डेफिसिट दोगुना होकर $147 बिलियन तक पहुंच गया, क्योंकि अमेरिकी कंपनियों ने AI में निवेश के लिए इम्पोर्ट्स बढ़ाए। मेक्सिको के साथ भी ट्रेड गैप रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, जहाँ गुड्स डेफिसिट अकेले $197 बिलियन रहा। इसके उलट, कनाडा के साथ एनुअल गुड्स डेफिसिट 26% घटकर $46 बिलियन पर आ गया।
AI का जलवा: इम्पोर्ट्स में बंपर उछाल
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए ज़रूरी टेक्नोलॉजी की भारी मांग ने इम्पोर्ट्स के आंकड़ों को सीधे तौर पर प्रभावित किया। साल 2025 में अमेरिकी कंपनियों ने कंप्यूटर चिप्स और अन्य टेक कंपोनेंट्स के इम्पोर्ट्स को 4.2% तक बढ़ा दिया, जिससे गुड्स डेफिसिट $1.24 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। AI डेवलपमेंट के लिए ज़रूरी कंप्यूटर एक्सेसरीज़ और कैपिटल गुड्स (Capital Goods) के इम्पोर्ट्स इस ट्रेंड में सबसे आगे रहे। यह साफ दिखाता है कि कैसे टेक्नोलॉजिकल तरक्की, टैरिफ के असर को भी पार कर इम्पोर्ट्स पर दबाव बना सकती है।
टैरिफ की असरदारता पर सवाल?
2025 के दौरान लागू की गईं तमाम टैरिफ नीतियों के बावजूद, ओवरऑल US ट्रेड डेफिसिट को कम करने में उनकी भूमिका सीमित रही। हालाँकि टैरिफ ने ट्रेड फ्लो को जरूर बदला, खासकर चीन के साथ डेफिसिट को कम किया, लेकिन कुल डेफिसिट को रिकॉर्ड स्तर से नीचे लाने में नाकाम रहे। कई बार बिजनेस ने कम टैरिफ वाले देशों का रुख किया, जिससे असल में ट्रेड वॉल्यूम कम होने की बजाय 'ट्रेड डाइवर्जन' (Trade Diversion) हुआ। ऊँची ड्यूटी के बावजूद इम्पोर्ट्स में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि कुछ गुड्स की डिमांड पर ज्यादा असर नहीं पड़ा या फिर सोर्सिंग के वैकल्पिक रास्ते अपनाए गए।
चिंताएँ: लगातार बढ़ता घाटा और ट्रेड डाइवर्जन
लगातार बड़े ट्रेड डेफिसिट, खासकर जब टैरिफ जैसी संरक्षणवादी नीतियां लागू हों, तो ये आर्थिक जोखिम पैदा करते हैं। ताइवान और वियतनाम जैसे देशों के साथ बढ़ता व्यापार घाटा, जहाँ चीन से ट्रेड डाइवर्जन का फायदा मिला, भविष्य में ट्रेड विवाद का नया बिंदु बन सकता है। इसके अलावा, टेक्नोलॉजी और अन्य सामानों की घरेलू मांग के कारण इम्पोर्ट्स में भारी बढ़ोतरी, यह दर्शाती है कि खपत घरेलू उत्पादन से कहीं ज्यादा है, और विदेशी सप्लाय चेन पर निर्भरता बनी हुई है। यह ढांचागत व्यापार असंतुलन को कायम रख सकता है।
आगे का रास्ता और लेबर मार्केट की मजबूती
भविष्य में, ग्लोबल डिमांड, टेक्नोलॉजिकल इन्वेस्टमेंट और बदलती ट्रेड पॉलिसी का जटिल तालमेल US ट्रेड बैलेंस को आकार देता रहेगा। एक अलग खबर के तौर पर, अमेरिका के लेबर मार्केट (Labor Market) में मजबूती के संकेत मिले हैं। 14 फरवरी, 2026 को समाप्त हुए हफ्ते में शुरुआती बेरोज़गारी दावों (Initial Jobless Claims) में 23,000 की गिरावट आई और यह 206,000 पर आ गए, जो रोजगार क्षेत्र में लचीलापन दिखाता है। यह मजबूती कंज्यूमर डिमांड को बनाए रख सकती है, जिससे इम्पोर्ट्स का स्तर बना रह सकता है।