अमेरिका के एक प्रमुख थिंक टैंक ने भारत के लिए 30-सूत्रीय सुधार एजेंडा पेश किया है। इसमें अगले एक दशक में सभी सरकारी कंपनियों (CPSEs) को प्राइवेटाइज करने का प्रस्ताव है। रिपोर्ट में पेट्रोलियम, बिजली, रियल एस्टेट और शराब को भी GST के दायरे में लाने की सलाह दी गई है, जिसका मकसद आर्थिक विकास को तेज करना और भारत की ग्लोबल बिज़नेस में भागीदारी बढ़ाना है।
Detailed Coverage
सरकारी कंपनियों को प्राइवेट बनाने का रोडमैप
सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS), जो अमेरिका का एक जाना-माना रिसर्च संस्थान है, ने भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए एक विस्तृत सुधार योजना जारी की है। इस योजना का सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि अगले 10 सालों के भीतर सभी सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) को प्राइवेट हाथों में सौंप दिया जाए। इसका मुख्य उद्देश्य वाणिज्यिक गतिविधियों में सरकार की सीधी भागीदारी को कम करके एक अधिक प्रतिस्पर्धी बाज़ार तैयार करना है।
GST का दायरा बढ़ाने की वकालत
CSIS की रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा यह है कि पेट्रोलियम उत्पाद, बिजली, रियल एस्टेट और शराब जैसे क्षेत्रों को भी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) प्रणाली के तहत लाया जाए। वर्तमान में इन सेक्टरों पर राज्य और केंद्र सरकार के कई तरह के टैक्स लागू होते हैं। इन सबको GST में शामिल करने से कंपनियों के लिए टैक्स फाइलिंग आसान होगी, छिपे हुए टैक्स का बोझ कम होगा और सरकार को भी एक पारदर्शी व अनुमानित रेवेन्यू मिलेगा।
अन्य महत्वपूर्ण सुधार
रिपोर्ट में ऐसे कई क्षेत्रों का भी जिक्र है जहाँ प्रक्रियात्मक बदलावों से व्यापार करना आसान हो सकता है। इसमें ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाना शामिल है, जो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है। साथ ही, पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी को घटाकर 33% करने का सुझाव भी दिया गया है। इसके अलावा, थिंक टैंक एक एकीकृत ऑनलाइन डिस्प्यूट रेज़ोल्यूशन सिस्टम की वकालत करता है, जिससे कंपनियों को लंबे समय से चल रहे कानूनी मामलों में लगने वाले समय और पैसे की बचत होगी।
भविष्य की राह और सरकारी नीति
CSIS के अर्थशास्त्री रिचर्ड रॉसॉव का कहना है कि भारतीय सरकार पहले से ही इस एजेंडे के कुछ हिस्सों पर काम कर चुकी है, जैसे कि जन विश्वास बिल 2.0 पास करना और परमाणु ऊर्जा को निजी क्षेत्र के लिए खोलना। यह दर्शाता है कि नीतिगत उदारीकरण की दिशा में एक गति बन रही है। हालाँकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सरकारी कंपनियों का प्राइवेटाइजेशन और टैक्स संरचनाओं में बदलाव जैसे कदम राजनीतिक और आर्थिक रूप से काफी जटिल होंगे। ये प्रस्ताव भविष्य के नीति निर्माताओं के लिए भारत के आर्थिक ढांचे को मजबूत करने के लिए एक गाइड के रूप में काम करेंगे। बाज़ार के जानकार और निवेशक इस बात पर नज़र रखेंगे कि क्या सरकार भविष्य के बजट या सत्रों में इनमें से किसी भी संरचनात्मक सुझाव को अपनाती है।
