अमेरिका ने इंपोर्टेड जेनेरिक दवाओं के लिए एक फेज्ड टैरिफ प्लान का ऐलान किया है, जिसकी शुरुआत दो साल की ड्यूटी-फ्री विंडो से होगी। इससे भारतीय फार्मा एक्सपोर्टर्स को टैरिफ के बढ़ने से पहले अपनी मैन्युफैक्चरिंग स्ट्रेटेजी को एडजस्ट करने के लिए जुलाई 2028 तक का समय मिल गया है।
Detailed Coverage
अमेरिका का बड़ा फैसला, भारतीय फार्मा कंपनियों को मिली राहत
अमेरिका की सरकार ने इंपोर्टेड जेनेरिक दवाओं के लिए एक नया टैरिफ रोडमैप जारी किया है, जिसने भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए व्यापार परिदृश्य में बड़ा बदलाव ला दिया है। इस प्लान के तहत, अगले दो साल तक, यानी जुलाई 2028 तक, जेनेरिक दवाएं ड्यूटी-फ्री रहेंगी। इस अवधि के बाद, इंपोर्ट पर पहले एक साल के लिए 100% टैरिफ लगेगा, जो बाद में बढ़कर 200% हो जाएगा।
क्या है इस पॉलिसी के पीछे की वजह?
यह पॉलिसी कंपनियों को अपनी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज को अमेरिका के अंदर ले जाने के लिए प्रोत्साहित करने के बड़े प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, तत्काल एक्सपोर्ट पर इसका असर सीमित है, लेकिन दोनों देशों के बीच फार्मा ट्रेड की लॉन्ग-टर्म संरचना एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। आपको बता दें कि वर्तमान में, अमेरिका, भारत के टोटल फार्मा एक्सपोर्ट का लगभग 34% हिस्सा है, जो फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में $30.47 बिलियन तक पहुंच गया था।
कौन सी कंपनियां होंगी प्रभावित?
जिन कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग साइट्स पहले से ही अमेरिका में स्थापित हैं, उन्हें अपने ऑपरेशन्स को एडजस्ट करने में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिल सकती है। Dr. Reddy’s Laboratories, Aurobindo Pharma, Cipla, Lupin, और Zydus Lifesciences जैसी कंपनियां सालों से अमेरिकी बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी हैं, जो उन्हें इस बदलाव से निपटने में मदद कर सकती है। वहीं, Alkem Laboratories और Torrent Pharmaceuticals जैसी कंपनियों, जिनकी प्रोडक्शन का बड़ा हिस्सा भारत पर केंद्रित है, के लिए यह दो-साल की विंडो एक ज़रूरी समय-सीमा प्रदान करती है। वे अमेरिकी प्रोडक्शन बढ़ाने या कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग पार्टनरशिप में प्रवेश करने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती हैं ताकि अपनी कॉम्पिटिटिव पोजीशन बनाए रख सकें।
आगे क्या?
चूंकि जेनेरिक दवाएं अमेरिका में 90% से अधिक प्रिस्क्रिप्शन के लिए इस्तेमाल होती हैं, इसलिए सस्ती इंपोर्ट पर निर्भरता अधिक है। हालांकि, हायर टैरिफ की ओर यह कदम डोमेस्टिक ड्रग प्रोडक्शन कैपेसिटी को फिर से बनाने का इरादा रखता है। भारतीय फर्मों के लिए, मुख्य चुनौती प्रॉफिट मार्जिन पर संभावित असर की है, खासकर अगर उन्हें हाई-कॉस्ट रीजन में प्रोडक्शन शिफ्ट करना पड़ता है या फिर भारी इंपोर्ट टैक्स का सामना करना पड़ता है। इन्वेस्टर्स इन कंपनियों द्वारा आने वाली तिमाहियों में अपने कैपिटल स्पेंडिंग और सप्लाई चेन स्ट्रेटेजी में किए जाने वाले एडजस्टमेंट्स पर बारीकी से नजर रखेंगे। अगला महत्वपूर्ण अपडेट इन नियमों की औपचारिक फाइलिंग और अमेरिका के लिए उनकी लॉन्ग-टर्म मैन्युफैक्चरिंग और डिस्ट्रीब्यूशन प्लान पर कंपनियों से मिलने वाले किसी भी अगले गाइडेंस पर होगा।
