US National Debt: GDP से ऊपर पहुंचा कर्ज़, बढ़ी ग्लोबल ब्याज दरों की चिंता!

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
US National Debt: GDP से ऊपर पहुंचा कर्ज़, बढ़ी ग्लोबल ब्याज दरों की चिंता!

अमेरिका का नेशनल डेट (National Debt) अब देश की GDP यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (Gross Domestic Product) के **100%** के पार निकल गया है। लगातार बजट घाटे के चलते बढ़ते इस कर्ज़ से ग्लोबल बॉरोइंग कॉस्ट (borrowing cost) बढ़ रही है और उभरते बाज़ारों पर दबाव आ सकता है।

Detailed Coverage

क्यों बढ़ रहा है अमेरिका का कर्ज़?

अमेरिका का नेशनल डेट (National Debt) एक चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है, जो अब देश की सालाना आर्थिक उत्पादन (GDP) के 100% से ज़्यादा हो गया है। यूएस ट्रेजरी डिपार्टमेंट (U.S. Treasury Department) के अनुसार, जनता का कर्ज़ बढ़कर $31.8 ट्रिलियन तक पहुँच गया है। यह लंबे समय से चले आ रहे उस ट्रेंड को दर्शाता है जहाँ सरकारी खर्च, आमदनी से कहीं ज़्यादा रहा है।

बढ़ती ब्याज दरों का असर

साल 2008 के वित्तीय संकट और COVID-19 महामारी के दौरान हुए भारी खर्च के अलावा, मौजूदा सालाना बजट घाटा (budget deficit) इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण है। कांग्रेसियल बजट ऑफिस (Congressional Budget Office) का अनुमान है कि मौजूदा फाइनेंशियल ईयर (financial year) में बजट घाटा GDP का लगभग 6% रहेगा। इस घाटे को पूरा करने के लिए, अमेरिकी सरकार को भारी मात्रा में ट्रेजरी बॉन्ड (Treasury bonds) जारी करने पड़ते हैं।

इन बॉन्ड्स की ज़्यादा सप्लाई के कारण, निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार को ज़्यादा इंटरेस्ट रेट (interest rate) ऑफर करने पड़ते हैं। जुलाई 2026 के मध्य तक, 10-साल के यूएस ट्रेजरी बिल्स (U.S. Treasury bills) की यील्ड (yield) लगभग 4.6% तक पहुँच गई थी, जो चार साल पहले 2.9% थी। जैसे-जैसे पुराना कर्ज़ मैच्योर (mature) हो रहा है, उसे मौजूदा बाज़ार दरों पर रीफाइनेंस (refinance) करना पड़ रहा है, जिससे फेडरल बजट पर ब्याज का बोझ बढ़ रहा है। यह एक ऐसा साइकिल बन गया है जहाँ ज़्यादा ब्याज भुगतान के लिए और ज़्यादा उधार लेना पड़ता है।

ग्लोबल बाज़ारों पर क्या होगा असर?

फिलहाल, अमेरिकी डॉलर दुनिया की मुख्य रिजर्व करेंसी (reserve currency) है, जिसने ऐतिहासिक रूप से अमेरिका को दूसरों की तुलना में कम दरों पर उधार लेने की सुविधा दी है। लेकिन जैसे-जैसे कर्ज़ बढ़ रहा है, ज़्यादा बॉरोइंग कॉस्ट का खतरा अमेरिकी सीमाओं से आगे फैल रहा है।

भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं (emerging markets) के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ज़्यादा यूएस इंटरेस्ट रेट अक्सर डॉलर को मज़बूत करते हैं, जिससे दूसरे देशों के लिए इंपोर्ट (import) महंगा हो जाता है और जिन कंपनियों ने डॉलर में उधार लिया है, उनके लिए कर्ज़ चुकाना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, जब यूएस ट्रेजरी यील्ड्स ज़्यादा होती हैं, तो ग्लोबल निवेशक अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा और ज़्यादा रिटर्न की तलाश में उभरते बाज़ारों से पैसा निकाल सकते हैं। इससे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के इक्विटी (equity) और करेंसी बाज़ारों में अस्थिरता बढ़ सकती है।

लंबी अवधि की वित्तीय स्थिरता

यूएस गवर्नमेंट एकाउंटेबिलिटी ऑफिस (U.S. Government Accountability Office - GAO) ने चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा वित्तीय नीतियां जारी रहीं, तो अगले दशक में कर्ज़ अर्थव्यवस्था की दोगुनी रफ़्तार से बढ़ सकता है। अगले 30 सालों में, अनुमान है कि कर्ज़ अमेरिकी अर्थव्यवस्था का 2.5 गुना तक पहुँच सकता है। इससे निपटने के लिए सरकारी खर्च (बढ़ते रक्षा व्यय सहित) और आमदनी के बीच संतुलन बनाने के लिए एक लंबी अवधि की वित्तीय रणनीति की ज़रूरत होगी। ग्लोबल निवेशकों के लिए मुख्य चिंता का विषय यूएस ट्रेजरी यील्ड्स की दिशा और फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की नीतियों में कोई भी बदलाव होगा, क्योंकि सरकार इन संरचनात्मक वित्तीय दबावों से निपटने की कोशिश कर रही है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.