अमेरिका से चिंताजनक खबर आई है। मई महीने में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) यानी महंगाई दर बढ़कर **4.1%** पर पहुंच गई है। यह लगातार तीसरा महीना है जब महंगाई बढ़ी है और अप्रैल 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। इस आंकड़े के बाद फेडरल रिजर्व (Fed) की तरफ से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें काफी कम हो गई हैं।
क्या हुआ है?
अमेरिका के ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक एनालिसिस (Bureau of Economic Analysis) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मई में पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर्स (PCE) प्राइस इंडेक्स 4.1% बढ़ा। यह लगातार तीसरा महीना है जब इसमें बढ़ोतरी देखी गई है और यह अप्रैल 2023 के बाद का उच्चतम स्तर है। यह डेटा दिखाता है कि महंगाई अभी भी नियंत्रण में नहीं आई है। फेडरल रिजर्व अपनी ब्याज दरों पर फैसले के लिए इसी इंडेक्स पर निर्भर करता है, इसलिए महंगाई का यह लगातार बढ़ना इस बात का संकेत है कि शायद ब्याज दरों में कटौती उतनी जल्दी न हो पाए जितनी निवेशक उम्मीद कर रहे थे।
भारतीय निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
अमेरिका के फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें तय करने की नीति का सीधा असर भारत सहित दुनिया भर के बाजारों पर पड़ता है। जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो ग्लोबल निवेशक अक्सर अपने पैसे को अमेरिकी डॉलर में रखना पसंद करते हैं, क्योंकि इसे सुरक्षित माना जाता है और इस पर अच्छा रिटर्न भी मिलता है। ऐसे में, यह फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) को भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालने के लिए प्रेरित कर सकता है।
इसके अलावा, जब ऊंची ब्याज दरों के कारण अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तो इसका सीधा दबाव भारतीय रुपये पर पड़ता है। कमजोर रुपया भारत के लिए कच्चे तेल जैसे आयात को महंगा बना सकता है, जिससे देश के व्यापार संतुलन और महंगाई पर असर पड़ सकता है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था और फेड की चाल
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उम्मीद से ज्यादा मजबूती दिख रही है, जिससे फेडरल रिजर्व को ब्याज दरों को ऊंची बनाए रखने की सहूलियत मिल रही है। पहली तिमाही के GDP के आंकड़े बढ़कर 2.1% हो गए हैं। इसके अलावा, पर्सनल स्पेंडिंग में $156.1 बिलियन की बढ़ोतरी हुई है, जो मांग में मजबूती दिखाती है। हालांकि, एक मजबूत अर्थव्यवस्था आम तौर पर अच्छी बात है, लेकिन मौजूदा हालात में इसका मतलब है कि फेड को अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए दरों में कटौती की तत्काल आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है।
लेबर मार्केट के संकेत
अमेरिकी लेबर मार्केट से मिले-जुले संकेत मिल रहे हैं। 8 जून को समाप्त सप्ताह के लिए शुरुआती जॉबलेस क्लेम्स (Initial jobless claims) घटकर 215,000 पर आ गए, जो चार हफ्तों का निचला स्तर है। हालांकि, लगातार क्लेम्स (continuing claims) तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए। यह कुछ कमजोरियों की ओर इशारा करता है, लेकिन कुल मिलाकर रोजगार की स्थिति इतनी मजबूत है कि केंद्रीय बैंक नौकरियों को बचाने के लिए दरों में कटौती जैसे कदम उठाने को मजबूर नहीं है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
भारतीय निवेशकों के लिए, सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि अमेरिकी आर्थिक आंकड़े ग्लोबल लिक्विडिटी को कैसे प्रभावित करते हैं। नजर रखने वाली प्रमुख चीजें हैं - अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड (US 10-year Treasury yield), जो अक्सर ब्याज दरों की उम्मीदों के साथ ऊपर-नीचे होता है, और US डॉलर इंडेक्स (DXY)। अगर इनमें बढ़ोतरी होती है, तो भारतीय इक्विटी में FII फ्लो में अस्थिरता बढ़ सकती है। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व के अधिकारियों की भविष्य की नीतियों पर टिप्पणी पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह वैश्विक बाजारों की दिशा का अगला संकेत देगा।
