यह समझौता अमेरिका से भारत आने वाले कई तरह के औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों पर लगे टैरिफ (Tariff) को खत्म करने या घटाने का प्रावधान करता है। हालांकि, इस डील से भारतीय किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं, खासकर तब जब सरकार का कहना है कि संवेदनशील क्षेत्रों को बचाया गया है।
डील के मुख्य बिंदु
समझौते के तहत, भारत अमेरिका से आने वाले ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGS), रेड सोरघम, ट्री नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पादों पर टैरिफ को खत्म करेगा या कम करेगा। वहीं, अमेरिका भी भारतीय सामानों पर अपने टैरिफ को 50% से घटाकर औसतन 18% कर देगा। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के ऑफिस का कहना है कि इससे अमेरिकी किसानों के लिए भारत में बाजार पहुंच काफी बढ़ेगी।
सरकार का आश्वासन बनाम किसानों की आशंका
दूसरी ओर, भारतीय अधिकारियों, जिनमें कॉमर्स मिनिस्टर पियूष गोयल भी शामिल हैं, ने भरोसा दिलाया है कि अनाज, फल, सब्जियां, तेल बीज, डेयरी और मांस जैसे संवेदनशील कृषि उत्पाद सुरक्षित रहेंगे। इसके बावजूद, इस सौदे में अमेरिका को दी गई रियायतों को लेकर बारीकी से जांच की जा रही है कि कहीं ये भारत के लाखों किसानों की आजीविका को प्रभावित न करें।
वैश्विक और स्थानीय बाजार का विश्लेषण
भारत का सोयाबीन तेल का इम्पोर्ट, जो फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में 47.83 लाख टन (लगभग $5.049 बिलियन) था, काफी हद तक अर्जेंटीना और ब्राजील से आता है। ये देश दुनिया के बड़े सोयाबीन उत्पादक भी हैं। खासकर अर्जेंटीना, अपने एक्सपोर्ट टैक्स (Export Tax) को एडजस्ट करके भारत को सोयाबीन तेल बेचने में काफी कॉम्पिटिटिव (Competitive) साबित हो रहा है। इसी तरह, FY24-25 में भारत ने अमेरिका से $1.12 बिलियन के ताजे फल इम्पोर्ट किए, लेकिन वैश्विक फल व्यापार में अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे देशों का दबदबा है। ग्लोबल फ्रेश प्रोड्यूस मार्केट (Global Fresh Produce Market) में जलवायु परिवर्तन और व्यापारिक उतार-चढ़ाव का असर दिख रहा है, जिससे उत्पादकों को अपने एक्सपोर्ट रूट बदलने पड़ रहे हैं।
मौजूदा ट्रेंड्स और संभावित बढ़त
यह भी देखा गया है कि एक औपचारिक डील के बिना भी अमेरिका से भारत में ट्री नट्स, कॉटन और सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों का एक्सपोर्ट पहले से ही बढ़ रहा था। यह नया समझौता इन इम्पोर्ट्स को और बढ़ा सकता है, जिससे घरेलू कीमतों में स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
किसानों के लिए चिंताएं
चिंताएं बढ़ रही हैं कि टैरिफ में कटौती से भारतीय किसानों पर बुरा असर पड़ सकता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (Global Trade Research Initiative) के अजय श्रीवास्तव जैसे एक्सपर्ट्स ने आशंका जताई है कि अमेरिकी ताजे फल और सोयाबीन तेल पर टैरिफ में कटौती से "भारतीय किसानों को नुकसान होगा"।
संरचनात्मक असमानताएं और पिछला संघर्ष
ऐतिहासिक रूप से, ट्रेड एग्रीमेंट्स (Trade Agreements) का भारतीय कृषि एक्सपोर्ट्स पर मिला-जुला असर रहा है। भारत के किसानों, जिनकी औसत जमीन 1 हेक्टेयर है, की तुलना में अमेरिकी किसानों (जिनकी औसत जमीन 176 हेक्टेयर है) के साथ कॉम्पिटिटिव (Competitive) बने रहना एक बड़ी चुनौती है। 2020 में हुए किसान आंदोलन भी कॉर्पोरेट दखल और किसानों के मार्केट एक्सेस (Market Access) को लेकर गहरी चिंताओं को दर्शाते हैं।
विपक्ष की राय और जीएम फसलों का मुद्दा
विपक्षी पार्टियां भी इस डील की आलोचना कर रही हैं। वे 'अतिरिक्त उत्पादों' की सटीक परिभाषा पर सवाल उठा रही हैं और डेयरी, गेहूं व अन्य संवेदनशील कमोडिटीज (Commodities) के इम्पोर्ट में बढ़ोत्तरी की आशंका जता रही हैं। भारत में सोयाबीन तेल और मक्का जैसे उत्पादों का घरेलू उत्पादन मजबूत है, लेकिन अमेरिका से बढ़ते इम्पोर्ट, खासकर जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों के मामले में, जो भारत प्रतिबंधित करता है, एक चुनौती पेश कर सकता है।
खाद्य तेल पर निर्भरता और रुपये का प्रभाव
भारत अपनी खाद्य तेल की लगभग 60% जरूरत इम्पोर्ट से पूरी करता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो इम्पोर्टेड तेल की कीमतें और बढ़ जाती हैं, जिससे घरेलू और विदेशी तेल की कीमतों का अंतर चौड़ा हो जाता है। हाल ही में, कमजोर रुपये की वजह से अर्जेंटीना और ब्राजील से सोयाबीन तेल की शिपमेंट (Shipment) को रद्द करने की खबरें भी आई थीं।
भविष्य की राह
भारतीय कृषि क्षेत्र के तेजी से बढ़ने का अनुमान है। उम्मीद है कि यह 2047 तक $1.8 से $3.1 ट्रिलियन तक पहुंच जाएगा, जो घरेलू मांग, एग्रीटेक इनोवेशन (Agritech Innovation) और एक्सपोर्ट्स में बढ़ोत्तरी से संचालित होगा। हालांकि, यह उम्मीदें वैश्विक बाजार के दबावों से निपटने और घरेलू कमजोरियों को दूर करने पर निर्भर करती हैं। यह अंतरिम समझौता कुछ एक्सपोर्टर्स के लिए अनिश्चितता कम कर सकता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुविधाजनक बनाने और भारत की विशाल किसान आबादी की आजीविका की रक्षा करने के बीच सही संतुलन बना पाएगा, खासकर अमेरिकी कृषि इम्पोर्ट्स से बढ़ी प्रतिस्पर्धा के सामने।