बातचीत का अंतिम दौर
अमेरिका और भारत के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता अब अपने आखिरी मुकाम पर पहुँच गया है। हाल ही में हुई मुलाकातों के बाद, अब बस कुछ ही फीसदी मुद्दे बाकी रह गए हैं जिन्हें सुलझाने की कोशिश की जा रही है। यह समझौता सिर्फ सामानों के व्यापार से आगे बढ़कर टेक्नोलॉजी और एनर्जी जैसे हाई-वैल्यू सेक्टर में सहयोग पर केंद्रित है। इस डील में तेजी इसलिए भी दिख रही है ताकि बदलते राजनीतिक माहौल से पहले मौजूदा भू-राजनीतिक तालमेल का फायदा उठाया जा सके।
सेक्टर-स्पेसिफिक फायदे और मार्केट पर असर
पिछली व्यापार संधियों के विपरीत, यह नया फ्रेमवर्क डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग को जोड़ने पर जोर दे रहा है। US-India COMPACT इनिशिएटिव के साथ मिलकर, यह समझौता ग्लोबल सप्लाई चेन के जोखिमों को कम करने का लक्ष्य रखता है। खासकर उन निर्भरताओं को खत्म करने की कोशिश है, जिनसे पिछले दो सालों में प्रोडक्शन में दिक्कतें आई हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि इससे क्रॉस-बॉर्डर सर्विस फ्लो पर क्या असर पड़ता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार $220 बिलियन के पार जा चुका है। ऐसे समझौते अक्सर डिफेंस, एविएशन और डिजिटल सर्विस जैसे क्षेत्रों को फायदा पहुंचाते हैं, जिनमें तेजी से सहयोग की उम्मीद है।
समझौते में छिपे खतरे
हालांकि, एक अंतिम समझौते की उम्मीदें कुछ गहरी समस्याओं के कारण थोड़ी कम हो सकती हैं। सबसे बड़ा जोखिम अमेरिका की उम्मीदों और भारत की लोकल कंटेंट पॉलिसी के बीच के अंतर से जुड़ा है। पिछले विवादों में रेगुलेटरी लागू करने में असमानता एक बड़ी वजह रही है, जिससे पॉलिटिकल कमिटमेंट के बावजूद विदेशी निवेश में दिक्कतें आती हैं। इसके अलावा, एक विस्तृत संधि की बजाय एक अंतरिम समझौते पर निर्भर रहने से एग्रीकल्चर सब्सिडी और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी जैसे अहम मुद्दे अनसुलझे रह सकते हैं। अगर ये मूल बाधाएं दूर नहीं होतीं, तो यह डील सिर्फ एक सिम्बॉलिक कदम साबित हो सकती है और उम्मीद के मुताबिक आर्थिक फायदा नहीं दे पाएगी।
आगे की राह
अमेरिका के प्रतिनिधियों की भारत की अगली यात्रा इस समझौते के असली दायरे का संकेत देगी। अगर बातचीत सिर्फ तकनीकी मुद्दों से आगे बढ़कर रेगुलेटरी अलाइनमेंट तक जाती है, तो यह एक बड़े आर्थिक एकीकरण की ओर इशारा करेगा। वहीं, अगर यह डील तय समय में पूरी नहीं होती है, तो यह वर्तमान रणनीतिक साझेदारी की सीमाओं को उजागर कर सकती है। एनालिस्ट्स इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि यह डील कंपनियों के लिए असली बाजार विस्तार लाएगी या मौजूदा मल्टीनेशनल फर्मों के लिए सिर्फ कंप्लायंस की नई परतें जोड़ेगी।
