US-India Trade Pact: भारत ने मानी अमेरिका की बात! टैरिफ राहत के बदले दी बड़ी छूटें

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
US-India Trade Pact: भारत ने मानी अमेरिका की बात! टैरिफ राहत के बदले दी बड़ी छूटें
Overview

भारत और अमेरिका के बीच एक अहम अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) की रूपरेखा तैयार हो गई है। इस समझौते के तहत अमेरिका भारतीय सामानों पर लगने वाले टैरिफ (Tariff) को कम करेगा, लेकिन इसके बदले भारत को कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर अमेरिका की शर्तें माननी होंगी।

रेग्युलेटरी अड़चनें हटेंगी?

अमेरिका की ओर से भारत को इस डील में लंबे समय से चले आ रहे रेग्युलेटरी (Regulatory) अड़चनों को दूर करने की मांग की गई है, खासकर मेडिकल डिवाइसेज (Medical Devices) के मामले में। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने अमेरिकी मेडिकल डिवाइसेज से जुड़े नियमों की समीक्षा करने पर सहमति जताई है। इसमें कोरोनरी स्टेंट (Coronary Stent) जैसी चीजों पर प्राइस कैप (Price Cap) पर फिर से विचार करना भी शामिल हो सकता है, जिससे देश में हेल्थकेयर का खर्च बढ़ सकता है।

इसके अलावा, अमेरिका चाहता है कि इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (ICT) गुड्स (Goods) के इम्पोर्ट (Import) लाइसेंसिंग (Licensing) को आसान बनाया जाए, जिससे साइबर सुरक्षा (Cybersecurity) को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि भारत की अपनी 'मेडिकल डिवाइसेज पॉलिसी 2023' घरेलू मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) को बढ़ावा देने के लिए है, लेकिन इन रियायतों से घरेलू इंडस्ट्री की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) और सेफ्टी स्टैंडर्ड्स (Safety Standards) पर असर पड़ने की आशंका है।

डिजिटल संप्रभुता पर सवाल?

इस डील का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल ट्रेड (Digital Trade) को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि अमेरिकी टेक कंपनियों (Tech Companies) के लिए भारत के मार्केट (Market) में फ्री एंट्री (Free Entry) के नियम स्पष्ट हों, जिससे भारत सरकार के डेटा फ्लो (Data Flow) और बड़े टेक प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट (Regulate) करने की क्षमता सीमित हो सकती है।

भारत ने द्विपक्षीय डिजिटल ट्रेड रूल्स (Digital Trade Rules) पर बातचीत करने का भी वादा किया है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन (Electronic Transmission) पर कस्टम ड्यूटी (Custom Duty) लगाना बैन (Ban) होगा। यह भारत के वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के रुख से एक बड़ा बदलाव है, जहां भारत दो दशकों से ऐसे मोरेटोरियम (Moratorium) का विरोध करता आया है, ताकि रेवेन्यू (Revenue) का नुकसान न हो और घरेलू इंडस्ट्री बच सके।

हालांकि भारत ने डिजिटल सर्विस टैक्स (Digital Service Tax) खत्म कर दिया है, लेकिन अमेरिकी कंपनियों के लिए ऐसे टैक्स दोबारा न लगाने और डिजिटल गुड्स पर कस्टम ड्यूटी हटाने की बात भविष्य में भारत के वित्तीय और रेग्युलेटरी विकल्पों को सीमित कर सकती है।

इकोनॉमिक सिक्योरिटी का खिचड़ी-पाका?

दोनों देशों के बीच 'इकोनॉमिक सिक्योरिटी अलाइनमेंट' (Economic Security Alignment) को मजबूत करने की बात कही गई है। इसमें सप्लाई चेन (Supply Chain) पर सहयोग, तीसरे देशों की 'नॉन-मार्केट पॉलिसीज' (Non-Market Policies) के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई, और इन्वेस्टमेंट स्क्रीनिंग (Investment Screening) व एक्सपोर्ट कंट्रोल (Export Control) में मिलकर काम करना शामिल है।

इस अलाइनमेंट से भारत की फॉरेन (Foreign), ट्रेड (Trade), और टेक्नोलॉजी पॉलिसीज (Technology Policies) अमेरिका की प्राथमिकताओं से ज्यादा जुड़ सकती हैं। इसका सीधा असर चीन और रूस जैसे देशों के साथ भारत के रिश्तों पर पड़ सकता है, और महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी या डिस्काउंटेड क्रूड ऑयल (Crude Oil) और फर्टिलाइजर्स (Fertilizers) जैसे संसाधनों तक भारत की पहुंच सीमित हो सकती है।

इन्वेस्टमेंट स्क्रीनिंग पर सहयोग से अहम भारतीय सेक्टर्स में तीसरे देशों का निवेश हतोत्साहित हो सकता है, जो भारत की 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' (Strategic Autonomy) की पुरानी रणनीति को सीधे चुनौती देता है।

रूसी तेल और 500 बिलियन डॉलर का खेल

समझौते में रूसी तेल (Russian Oil) के आयात को रोकने का कोई सीधा जिक्र नहीं है, लेकिन अमेरिकी सूत्रों का कहना है कि यह अप्रत्यक्ष रूप से टैरिफ राहत से जुड़ा था। यह भारत के लिए एक नाजुक स्थिति है, खासकर अगर रूस से तेल आयात फिर से शुरू होता है, तो टैरिफ पेनल्टी (Penalty) फिर से लग सकती है।

इस फ्रेमवर्क में भारत की अगले 5 सालों में $500 बिलियन के अमेरिकी गुड्स (US Goods) खरीदने की मंशा भी शामिल है। हालांकि, यह आंकड़ा सरकारी आदेशों के बजाय व्यावसायिक फैसलों पर आधारित लगता है, और इससे भारत का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) बढ़ सकता है।

टैरिफ राहत: कितना फायदा?

अमेरिका ने भारत के करीब 55% एक्सपोर्ट्स (Exports) पर लगने वाले टैरिफ को कम किया है। यह उन लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स (Labour-Intensive Sectors) के लिए बड़ी राहत है, जिन पर पहले 50% तक के पेनल्टी ड्यूटीज (Penalty Duties) लगी थीं। इन्हें 2025 के मध्य तक घटाकर 18% कर दिया जाएगा, जिससे पेनल्टी ड्यूटीज वापस हो जाएंगी।

यह एक स्वागत योग्य कदम है, खासकर तब जब चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर अभी भी ज्यादा पेनल्टी लगी हुई है। हालांकि, इन रेट्स के ऊपर स्टैंडर्ड मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) टैरिफ अभी भी लागू होंगे, जिसका मतलब है कि व्यापार की शर्तें पूरी तरह सामान्य नहीं हुई हैं।

रणनीतिक जोखिमों पर एक नज़र

टैरिफ राहत के तत्काल फायदे के बावजूद, इस अंतरिम समझौते में भारत के लिए बड़े रणनीतिक जोखिम (Strategic Risks) छिपे हैं। मेडिकल डिवाइसेज और ICT जैसे सेक्टर्स में रेग्युलेटरी सोवरेनिटी (Regulatory Sovereignty) पर मांगी गई रियायतें भारत के पॉलिसी स्पेस (Policy Space) को कम कर सकती हैं और सेफ्टी या साइबर सुरक्षा मानकों से समझौता करवा सकती हैं।

अनियंत्रित क्रॉस-बॉर्डर डेटा फ्लो (Cross-border Data Flow) और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर ड्यूटी बैन करने की प्रतिबद्धता भारत की डिजिटल इकोनॉमी (Digital Economy) को गवर्न (Govern) करने और रेवेन्यू स्ट्रीम्स (Revenue Streams) की सुरक्षा करने की क्षमता को सीमित कर सकती है, जिससे घरेलू इनोवेशन (Innovation) और डिजिटल इंडस्ट्री का ग्रोथ (Growth) रुक सकता है।

इसके अलावा, इकोनॉमिक सिक्योरिटी को अमेरिकी हितों से जोड़ना चीन और रूस जैसी बड़ी इकोनॉमीज के साथ संबंधों को बिगाड़ सकता है और गैर-अमेरिकी पार्टनर्स से महत्वपूर्ण विदेशी निवेश (Foreign Investment) को हतोत्साहित कर सकता है। यह जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) उलझन भारत के 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' के मूल सिद्धांत को सीधे तौर पर चुनौती देती है।

यह डील, जो मार्केट एक्सेस (Market Access) प्रदान करती है, भारत को अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर होने से बचने के लिए सावधानी से कैलिब्रेट (Calibrate) करने की आवश्यकता है।

आगे क्या?

यह अंतरिम समझौता एक फ्रेमवर्क के तौर पर काम करेगा, जो बड़े बायलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट (BTA) की बातचीत का रास्ता खोलेगा। जैसे-जैसे ये बातचीत आगे बढ़ेगी, भारत के सामने अपने आर्थिक हितों को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ संतुलित करने का महत्वपूर्ण काम होगा। मार्केट एक्सेस और टैरिफ लाभ हासिल करने के साथ-साथ पॉलिसी ऑटोनॉमी (Policy Autonomy) को बनाए रखना और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को विविधतापूर्ण रखना होगा। इस अप्रोच की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत इन प्रतिस्पर्धी मांगों को अपने मुख्य सिद्धांतों, यानी 'स्ट्रेटेजिक इंडिपेंडेंस' (Strategic Independence) से समझौता किए बिना कैसे संभालता है।

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