व्यापारिक राह में अंतिम पड़ाव
अमेरिका और भारत के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कवायद तेज़ हो गई है। अमेरिका के मुख्य व्यापार वार्ताकार जैमीसन ग्रीर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल 1 से 4 जून तक नई दिल्ली का दौरा करेगा। यह दौरा पिछले महीने वाशिंगटन डीसी में हुई विस्तृत चर्चाओं के बाद हो रहा है, जिसमें कथित तौर पर 99% मुद्दे सुलझा लिए गए थे। यह समझौता, जिसे दोनों देशों के बीच "21वीं सदी की साझेदारी" का आधार माना जा रहा है, व्यापार में अनिश्चितता को खत्म कर टैरिफ में कटौती और बाज़ार तक पहुंच बढ़ाने के लिए एक ढांचा तैयार करेगा।
टैरिफ में बदलाव का असर
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ को घटाकर 18% करना है। इससे भारतीय निर्यातकों को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बढ़त मिलने की उम्मीद है, खासकर टेक्सटाइल, चमड़ा और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में। हालांकि, इसके फायदे कुछ बड़ी शर्तों पर निर्भर करेंगे। भारत ने अगले पांच सालों में ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और रक्षा जैसे क्षेत्रों में अमेरिका से $500 बिलियन के आयात को बढ़ाने का 'बाय अमेरिकन' प्रोग्राम अपनाया है। साथ ही, यह समझौता भारत को रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने में भी मदद करेगा, जो कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन की व्यापार नीति के तहत टैरिफ में राहत पाने की एक अहम शर्त है।
विश्लेषकों की चिंता: बड़े आर्थिक लाभ की उम्मीद कम?
जहां नीति निर्माता इस डील को एक बड़ी सफलता मान रहे हैं, वहीं संस्थागत विश्लेषक इसके वास्तविक आर्थिक प्रभाव को लेकर सतर्क हैं। स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार, भारत की GDP में इसका नेट योगदान केवल 0.15% से 0.3% तक ही बढ़ सकता है, जो कि करीब $4 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के लिए कोई बड़ा बदलाव नहीं है। अभी भी कई बड़े जोखिम बने हुए हैं, जैसे कि अमेरिका से क्रूड तेल आयात पर बढ़ती लागत, जो टैरिफ में कटौती से होने वाले फायदों को कम कर सकती है। इसके अलावा, फार्मा सेक्टर, जो भारतीय निर्यात का एक अहम हिस्सा है, अमेरिकी घरेलू निर्माण प्रोत्साहन और ब्रांडेड दवाओं पर लगने वाले ऊंचे टैरिफ से प्रभावित हो सकता है, जिनका समाधान इस अंतरिम समझौते में नहीं है। कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि बातचीत के दौरान राजनीतिक दबाव तकनीकी आर्थिक विश्लेषण पर हावी रहा है।
आगे का रास्ता और सेक्टर पर असर
भविष्य में, इन नई व्यापार शर्तों को लागू करने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। उम्मीद है कि यह समझौता सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन, डेटा सेंटर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे हाई-वैल्यू सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देगा। हालांकि यह अंतरिम समझौता फिलहाल प्राथमिकता है, लेकिन इसकी सफलता व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की बातचीत के लिए एक पैमाना साबित होगी। दोनों देश क्षेत्रीय प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए इस साझेदारी की रणनीतिक आवश्यकता पर सहमत दिख रहे हैं, लेकिन इन पहलों की अंतिम सफलता निरंतर नियामक स्थिरता और जटिल वैश्विक व्यापार माहौल में व्यवसायों की अनुकूलन क्षमता पर निर्भर करेगी।
