अमेरिका-भारत ट्रेड डील: एनर्जी पर मिली बड़ी छूट, पर अमेरिकी एक्सपोर्टर्स के लिए वादे हुए कमजोर

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
अमेरिका-भारत ट्रेड डील: एनर्जी पर मिली बड़ी छूट, पर अमेरिकी एक्सपोर्टर्स के लिए वादे हुए कमजोर
Overview

अमेरिका और भारत के बीच व्यापार ढांचे (Trade Framework) में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। व्हाइट हाउस ने हाल ही में जारी अपनी फैक्टशीट में इस बात का संकेत दिया है। भारत को रूसी तेल के आयात को सीमित करने के बदले एनर्जी टैरिफ (Energy Tariff) से बड़ी राहत मिली है।

एनर्जी पर मिली राहत, पर बाकी मोर्चों पर नरमी

यह नई डील भारत के लिए एक बड़ी राहत लेकर आई है, खासकर एनर्जी सेक्टर में। व्हाइट हाउस की अपडेट की गई फैक्टशीट के मुताबिक, अमेरिका ने 7 फरवरी, 2026 से भारतीय सामानों पर लगने वाले अपने टैरिफ (Tariff) को 50% से घटाकर 18% कर दिया है। इतना ही नहीं, अगस्त 2025 में भारत द्वारा रूस से तेल आयात करने पर लगाया गया अतिरिक्त 25% का टैरिफ भी हटा दिया गया है। इस बड़ी छूट के पीछे की शर्त यह है कि भारत ने रूसी तेल के सीधे या अप्रत्यक्ष आयात को बंद कर दिया है, जिसे नई दिल्ली ने पूरा किया है।

अमेरिकी एक्सपोर्टर्स के लिए वादे हुए कमजोर

हालांकि, एनर्जी सेक्टर में मिली इस राहत के बावजूद, अमेरिका के कृषि और डिजिटल सेक्टर के एक्सपोर्टर्स के लिए अच्छी खबर नहीं है। पहले जहां यह कहा जा रहा था कि भारत 500 अरब डॉलर से ज़्यादा का अमेरिकी एनर्जी, टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर और अन्य उत्पाद खरीदेगा, वहीं अब इसे सिर्फ 'इरादा' (Intention) बताया गया है। यानी, भारत की ओर से इन खरीद को लेकर पहले जैसा पक्का वादा नहीं रहा।

कृषि के मोर्चे पर, 'सर्टेन पल्सेस' (certain pulses) जैसे खास उत्पादों के नाम टैरिफ कटौती की लिस्ट से हटा दिए गए हैं। वहीं, भारत की ओर से डिजिटल सर्विस टैक्स (Digital Services Tax) हटाने के दावे को भी फैक्टशीट से हटा दिया गया है। यह बदलाव बताते हैं कि भारत अपने घरेलू उद्योगों, खासकर कृषि और डिजिटल इकॉनमी को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने की अपनी 'आत्मनिर्भर भारत' की रणनीति पर कायम है।

भविष्य की राह और संभावित चुनौतियाँ

यह संशोधित ढांचा, भविष्य में अमेरिका-भारत के बीच एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) की ओर इशारा करता है। हालांकि, बातचीत अभी जारी रहेगी, खासकर नॉन-टैरिफ बैरियर्स (Non-Tariff Barriers), ओरिजिन रूल्स (Rules of Origin) और सेक्टर-स्पेसिफिक रेगुलेशंस (Sector-Specific Regulations) पर। अमेरिका की ओर से कुछ लोग इसे 'आर्थिक दबाव' (Economic Coercion) भी कह रहे हैं, जो भारत की रेगुलेटरी ऑटोनॉमी (Regulatory Autonomy) और डिजिटल सेक्टर के विकास को प्रभावित कर सकता है। यह देखना होगा कि भारत अपनी घरेलू प्राथमिकताओं को साधते हुए इस डील को कैसे आगे बढ़ाता है।

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