अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) की ओर से ब्याज दरें बढ़ाने के संकेतों ने भारतीय बॉन्ड मार्केट को झटका दिया है। इससे बॉन्ड की कीमतों में गिरावट आ सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की गिरती कीमतें और विदेशी फंड का इनफ्लो (inflow) भारतीय बाजार को कुछ राहत दे रहे हैं।
क्या हुआ?
गुरुवार को भारतीय सरकारी बॉन्ड मार्केट में गिरावट देखने को मिल सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) ने अपनी पॉलिसी में बदलाव के संकेत दिए हैं। पहले जहां ब्याज दरें स्थिर रहने या घटने की उम्मीद थी, वहीं अब इस साल के अंत तक दरें बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। यह बदलाव अमेरिका में महंगाई दर के 2% के लक्ष्य से ऊपर बने रहने की चिंताओं के कारण आया है।
इस घोषणा के बाद, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury yields) चार महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। चूंकि ग्लोबल कैपिटल अक्सर ऐसे एसेट्स (assets) की ओर बढ़ता है जहां रिटर्न ज्यादा और सुरक्षित हो, इसलिए अमेरिकी दरों में बढ़ोतरी से उभरते बाजारों के बॉन्ड, जिनमें भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) भी शामिल हैं, पर दबाव बनता है। ट्रेडर्स को उम्मीद है कि बेंचमार्क 6.94% 2036 बॉन्ड की यील्ड में उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा, और निवेशकों द्वारा इस खबर को पचाने के बाद कीमतों में रेजिस्टेंस (resistance) का सामना करना पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
निवेशकों के लिए बॉन्ड मार्केट को समझना बहुत जरूरी है। बॉन्ड की कीमतें और यील्ड विपरीत दिशाओं में काम करती हैं। जब वैश्विक निवेशक बढ़ती ब्याज दरों के कारण बॉन्ड से ज्यादा यील्ड की मांग करते हैं, तो मौजूदा बॉन्ड की कीमतें अक्सर गिर जाती हैं। यदि आपके पास डेट म्यूचुअल फंड (debt mutual funds) या सरकारी बॉन्ड हैं, तो यील्ड बढ़ने का मतलब है कि आपके पोर्टफोलियो का बाजार मूल्य अस्थायी रूप से कम हो सकता है।
जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का केंद्रीय बैंक, US Federal Reserve, ऊंची ब्याज दरों का संकेत देता है, तो यह एक ग्लोबल बेंचमार्क (global benchmark) की तरह काम करता है। यह अक्सर अन्य देशों को भी अपनी ब्याज दरों को आकर्षक बनाए रखने के लिए मजबूर करता है ताकि कैपिटल उनके बाजारों से बाहर न जाए, जिसका असर भारत में उधार लेने की लागतों (borrowing costs) के विकास पर पड़ सकता है।
संतुलन का खेल
हालांकि US Fed की खबर से दबाव बन रहा है, लेकिन कुछ ऐसे कारक भी हैं जो वर्तमान में भारतीय बाजार का समर्थन कर रहे हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कच्चे तेल की कीमत, जो $80 प्रति बैरल से नीचे कारोबार कर रही है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए जब कीमतें कम रहती हैं, तो देश के इंपोर्ट बिल और रुपये पर दबाव कम होता है। यह घरेलू महंगाई को नियंत्रण में रखने में मदद कर सकता है, जो बॉन्ड मार्केट के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
इसके अतिरिक्त, भारत में विदेशी निवेश का लगातार प्रवाह देखा गया है। पिछले नौ ट्रेडिंग सत्रों में, विदेशी निवेशकों ने लगभग $2.2 बिलियन का निवेश किया है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा डॉलर के इनफ्लो को बेहतर बनाने के हालिया उपायों का भी समर्थन मिला है। यह इनफ्लो (inflow) बॉन्ड की कीमतों में उस तेज गिरावट को रोकने में मदद करता है जो अन्यथा वैश्विक ब्याज दर की अस्थिरता के कारण हो सकती थी।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
निवेशकों को इन दो विपरीत ताकतों - बढ़ती वैश्विक ब्याज दरें और सहायक घरेलू मैक्रो-इकोनॉमिक कारक - के खेल पर नजर रखनी चाहिए। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव मुख्य रूप से ट्रैक करने योग्य होगा, क्योंकि किसी भी अचानक उछाल से भारत के लिए महंगाई का दृष्टिकोण बदल सकता है।
इसके अलावा, बाजार प्रतिभागी घरेलू लिक्विडिटी (liquidity) और मौद्रिक नीति के संबंध में Reserve Bank of India (RBI) से संकेतों की तलाश करेंगे। जबकि वैश्विक रुझान माहौल तय करते हैं, इन रुझानों पर RBI की प्रतिक्रिया ही अंततः भारतीय बॉन्ड यील्ड की दिशा तय करती है। विदेशी इनफ्लो का जारी रहना भी एक महत्वपूर्ण संकेत होगा, क्योंकि यह वैश्विक अनिश्चितता के सामने स्थानीय ऋण बाजार को आवश्यक स्थिरता प्रदान करता है।
