कीमतों पर नियंत्रण या प्रतिबंधों में ढील?
अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasury) ने रूस और ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों से राहत को 30 दिनों के लिए बढ़ा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा की कीमतों में भारी उठा-पटक देखी जा रही है। इस कदम का सीधा मकसद भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों को तत्काल राहत देना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में संभावित सप्लाई बाधाओं की चिंताओं को कम करना है। हालांकि, यह एक बड़ा बदलाव है जो इन देशों के लिए राजस्व कम करने के बजाय, अल्पकालिक बाजार स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
क्यों बढ़ा दी गई छूट?
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब कच्चा तेल (Crude Oil) की कीमतों में फिर से हलचल तेज हो गई थी। 22 अप्रैल, 2026 को ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें $100 प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं और WTI करीब $91 पर कारोबार कर रहा था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव की खबरें कीमतों को बढ़ा रही थीं। अमेरिकी ट्रेजरी ने 17 अप्रैल, 2026 तक लोड किए गए रूसी तेल की बिक्री को 16 मई, 2026 तक मंजूरी दी है। यह 30-दिवसीय छूट (waiver) ऐसे समय में आई है जब ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेन्ट (Scott Bessent) पहले संकेत दे चुके थे कि ऐसी छूटों का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। एनर्जी सेलेक्ट सेक्टर SPDR फंड (XLE) जैसी अमेरिकी एनर्जी कंपनियों का P/E अनुपात 17.33 से 19.96 के बीच है। इस विस्तार से एक महीने में लगभग 10 करोड़ बैरल रूसी और 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल की बिक्री हो सकेगी।
भारत को सीधा फायदा, ईरान को सहारा?
भारत के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है। हालांकि मार्च 2026 में भारत का कुल कच्चा तेल आयात 13% गिरा था, लेकिन रूस से आयात लगभग दोगुना होकर 50% तक पहुंच गया, जिससे रूस भारत का शीर्ष आपूर्तिकर्ता बन गया। वहीं, भारत के आयात में मध्य पूर्व के तेल की हिस्सेदारी घटकर ऐतिहासिक रूप से 26.3% के निचले स्तर पर आ गई। सेक्रेटरी बेसेन्ट ने इस बात के दावों को 'मिथक' बताया कि ईरान ने छूटों से $14 अरब से अधिक कमाया। इसके बावजूद, अन्य रिपोर्टें दिखाती हैं कि ईरान के तेल राजस्व में मार्च 2026 में काफी वृद्धि हुई थी। ईरान के पास समुद्र में लगभग 19 करोड़ बैरल कच्चा तेल पड़ा है, जिसकी कीमत $15 अरब से अधिक है। यह विस्तार प्रतिबंधों से जूझ रही पार्टियों को आर्थिक बढ़ावा दे सकता है।
अनिश्चितता और सप्लाई के खतरे
अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले ने नीतिगत अनिश्चितता (policy uncertainty) पैदा कर दी है। सेक्रेटरी बेसेन्ट का रुख, पहले छूट खत्म करने के संकेत देना और फिर 30 दिन का विस्तार देना, तीव्र भू-राजनीतिक दबावों और प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं को संतुलित करने की चुनौती को दर्शाता है। यह कदम लक्षित देशों को अमेरिका के इरादों पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसके अलावा, तेल परिवहन में भौतिक बाधाएं बनी हुई हैं। 22 अप्रैल, 2026 को, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से केवल तीन जहाज गुजरे, जबकि सामान्य दिनों में यह संख्या लगभग 100 होती है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने सबसे गंभीर ऊर्जा आपूर्ति व्यवधान की चेतावनी दी है।
आगे क्या?
विश्लेषकों का नजरिया मिला-जुला है। कुछ ने 2026 के लिए एकीकृत तेल और गैस कंपनियों की उम्मीदों को बढ़ाया है। जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च (J.P. Morgan Global Research) का अनुमान है कि 2026 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत $60/बैरल रहेगी, जबकि मॉर्निगस्टार डीबीआरएस (Morningstar DBRS) का अनुमान WTI के लिए $60/बैरल है, जो भू-राजनीतिक घटनाओं पर निर्भर करेगा। मुख्य बहस यही है कि क्या ये छूटें वास्तव में दीर्घकालिक बाजार स्थिरीकरण प्रदान करती हैं या केवल एक अस्थायी राहत हैं जो रणनीतिक प्रतिबंध लक्ष्यों को जटिल बनाती हैं।
