नई एनालिसिस बताती है कि अमेरिकी डॉलर का वैश्विक दबदबा अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कम होगा। हालांकि, फिलहाल कोई दूसरी करेंसी इसे रिप्लेस करने की स्थिति में नहीं है।
दुनिया की फाइनेंशियल सिस्टम आज भी काफी हद तक अमेरिकी डॉलर पर निर्भर है। फॉरेन एक्सचेंज ट्रांजैक्शन में लगभग 90% हिस्सेदारी डॉलर की है। भले ही रूस पर 2022 के सेंक्शन जैसे जियो-पॉलिटिकल घटनाओं के बाद डी-डॉलरराइजेशन (de-dollarization) की चर्चा तेज हुई है, लेकिन ऐतिहासिक तौर पर देखें तो मॉनेटरी पावर में बदलाव हमेशा धीरे-धीरे और छोटे-छोटे कदमों में ही हुए हैं।
डॉलर का दबदबा क्यों रहेगा बरकरार?
इकोनॉमिस्ट बैरी आइकेनग्रीन (Barry Eichengreen) ने अपनी नई एनालिसिस में बताया है कि डॉलर का स्टेटस कोई परमानेंट चीज नहीं है। इतिहास गवाह है कि जो करेंसी कभी डोमिनेंट थी, जैसे ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग या डच गिल्डर, वे अपने देशों के इकोनॉमिक पीक के काफी बाद तक भी हावी रहीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक स्थापित रिजर्व करेंसी के स्ट्रक्चरल फायदे, जैसे गहरी लिक्विडिटी (deep liquidity) और सेंट्रल बैंक की इंडिपेंडेंस पर भरोसा, को जल्दी से कॉपी नहीं किया जा सकता।
दूसरे करेंसी के लिए क्या हैं रुकावटें?
किसी भी करेंसी को डॉलर को चुनौती देने के लिए बड़े इंस्टीट्यूशनल बैरियर्स को पार करना होगा। यूरो, जो दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली करेंसी है, के सामने अलग-अलग मेंबर स्टेट्स के बीच बंटा हुआ बॉन्ड मार्केट (fragmented bond market) एक बड़ी रुकावट है। इससे एक ऐसी सिंगल, हाई-लिक्विडिटी एसेट नहीं बन पाती जो सीधे US ट्रेजरी का विकल्प बन सके।
वहीं, चीन की इकोनॉमिक ग्रोथ भले ही जबरदस्त हो, लेकिन उसके रेन्मिन्बी (renminbi) पर स्ट्रिक्ट कैपिटल कंट्रोल्स (strict capital controls) और सेंट्रल बैंकिंग सिस्टम की स्वायत्तता पर सवाल इसे ग्लोबल एक्सेसिबिलिटी के उस स्तर तक पहुंचने से रोकते हैं, जो प्राइमरी रिजर्व करेंसी के लिए जरूरी है। डिजिटल करेंसी और क्रिप्टो की बात करें तो, वे अभी तक स्टेबिलिटी और लीगल इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में इंटरनेशनल ट्रेड या सेंट्रल बैंक रिजर्व के लिए एक भरोसेमंद विकल्प नहीं बन पाए हैं।
'एक्सॉर्बिटेंट प्रिविलेज' का असर
डॉलर की यह भूमिका अमेरिका को 'एक्सॉर्बिटेंट प्रिविलेज' (exorbitant privilege) देती है। इससे अमेरिकी इकोनॉमी को कम ब्याज दरों पर उधार मिलता है, क्योंकि दुनिया भर में डॉलर की डिमांड हमेशा हाई रहती है। हालांकि, इसके अपने कॉम्प्लीकेशंस हैं। यह डोमेस्टिक एक्सपोर्ट को महंगा बना सकता है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस पर असर पड़ता है। जैसे-जैसे ज्यादा देश फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को डाइवर्सिफाई (diversify) करके एक ही करेंसी पर निर्भरता कम करना चाहेंगे, डॉलर का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।
निवेशकों और पॉलिसीमेकर्स के लिए, ग्लोबल ट्रेड सेटलमेंट सिस्टम (global trade settlement systems) का इवोल्यूशन और दूसरे लिक्विड डेट मार्केट्स (liquid debt markets) का डेवलपमेंट ही मुख्य नजर रखने वाली बातें होंगी। उम्मीद है कि नियर टर्म में डॉलर अपनी प्राइमरी पोजीशन बनाए रखेगा, लेकिन लॉन्ग टर्म ट्रेंड एक सिंगल करेंसी से अचानक रिप्लेसमेंट की बजाय एक मल्टीपोलर फाइनेंशियल एनवायरनमेंट (multipolar financial environment) की ओर इशारा कर रहा है।
