अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने माना है कि चीन महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की सप्लाई को लेकर अपने वादे पूरे नहीं कर रहा है। इससे अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग और डिफेंस सेक्टर पर असर पड़ रहा है।
चीन पर वादे पूरे न करने का आरोप
अमेरिकी व्यापार प्रशासन (US trade administration) के बीच यह आम राय बन रही है कि चीन मौजूदा व्यापार समझौते की अहम शर्तों का पालन नहीं कर रहा है, खासकर रेयर अर्थ मिनरल (Rare Earth Mineral) की सप्लाई के मामले में। ये मिनरल्स हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल प्रोडक्शन और डिफेंस इक्विपमेंट के लिए बेहद जरूरी हैं। सप्लाई में इस कमी के बावजूद, अमेरिकी सरकार सीधे टकराव के बजाय 'शांत कूटनीति' (quiet diplomacy) का रास्ता अपना रही है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य एक नया व्यापार युद्ध (trade war) शुरू होने से रोकना और हाई-लेवल डिप्लोमेटिक सम्मेलनों की प्रगति को बचाना है।
मैन्युफैक्चरिंग पर असर और कंपनियों की पहल
सप्लाई की दिक्कतें अमेरिका की उन बड़ी कंपनियों के लिए ऑपरेशनल समस्याएं पैदा कर रही हैं जो चीन से मिलने वाले खास कंपोनेंट्स और कच्चे माल पर निर्भर हैं। इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी कंपनियां, जैसे कि Applied Materials और Coherent, ने सीधे बीजिंग (Beijing) जाकर इस मसले को सुलझाने की पहल की है। उनके सीनियर एग्जीक्यूटिव्स ने बीजिंग का दौरा किया है ताकि नौकरशाही की देरी को दूर किया जा सके और उन लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं से निपटा जा सके, जिनकी वजह से कुछ जरूरी रेयर अर्थ मिनरल को हासिल करना मुश्किल हो गया है। US-China Business Council के अनुसार, ये सप्लाई चेन की दिक्कतें अमेरिकी फर्मों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
रेगुलेटरी और जियोपॉलिटिकल रिस्क
अमेरिकी प्रशासन इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है, लेकिन उसे एक मुश्किल संतुलन बनाना पड़ रहा है। एक्सपोर्ट कंट्रोल्स को मजबूत करने या जवाबी टैरिफ लगाने से लागत बढ़ सकती है और संवेदनशील राजनीतिक घटनाओं से पहले सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। दूसरी ओर, बीजिंग का कहना है कि उसके एक्सपोर्ट रेगुलेशन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं और उसने गैर-अनुपालन के आरोपों का लगातार खंडन किया है।
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कच्चे माल के कोटे पर कोई औपचारिक, लिखित प्रतिबद्धता न होने से स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। अमेरिका पहले भी राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए 'एंटीटी लिस्ट' (entity list) जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर चुका है, जिसमें कुछ फर्मों को पेंटागन के कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने से रोका जाता है। हालांकि, जब तक क्रिटिकल मिनरल्स के वैकल्पिक स्रोत विकसित नहीं हो जाते या महंगे बने रहते हैं, तब तक इन उपायों की प्रभावशीलता सीमित है।
निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि आने वाली डिप्लोमेटिक चर्चाओं से व्यापार नीति में कोई बदलाव आता है या नहीं। एक्सपोर्ट लाइसेंसिंग नियमों, एंटीटी लिस्ट में नए नामों, या कच्चे माल की उपलब्धता में किसी भी बदलाव पर नजर रखनी होगी, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस सप्लाई चेन पर निर्भर कंपनियों के लिए अहम संकेत होंगे। तब तक, कंपनियां जरूरी कंपोनेंट्स हासिल करने के लिए निजी कूटनीति पर निर्भर रहेंगी।
