अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'सैनशनिंग रशिया एक्ट' को समर्थन दिया है। इस बिल के तहत रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर **500%** तक का टैरिफ लग सकता है। यह भारत जैसे रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले बड़े देशों के लिए एक बड़ा व्यापारिक जोखिम पैदा कर सकता है। निवेशकों को इस पर नजर रखनी चाहिए कि यह कानून भारत की ऊर्जा खरीद लागत और रिफाइनिंग मार्जिन को कैसे प्रभावित करता है।
अमेरिका का नया दांव: रूस पर शिकंजा कसने की तैयारी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'सैनशनिंग रशिया एक्ट' (Sanctioning Russia Act) नाम के एक नए प्रस्तावित बिल का समर्थन किया है। इस बिल का मकसद रूस की ऊर्जा आय को रोकना है। इसके तहत, जो भी देश रूसी ऊर्जा क्षेत्र के साथ व्यापार करेंगे, उन पर 500% तक का सेकेंडरी टैरिफ (secondary tariff) लगाया जा सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के इस कदम से भारत जैसे प्रमुख कच्चे तेल आयातकों के लिए भविष्य में तेल की लागत और उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है।
भारत की ऊर्जा खरीद पर असर
भारत, रूसी कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण खरीदार रहा है। वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका के साथ कूटनीतिक चर्चाओं के आधार पर व्यापार की मात्रा में उतार-चढ़ाव आता रहा है। एनर्जी डेटा प्रोवाइडर Kpler के अनुसार, नवंबर 2025 में जहां भारत हर दिन लगभग 18.4 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल आयात कर रहा था, वहीं फरवरी 2026 तक यह आंकड़ा घटकर करीब 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह गिरावट व्यापार जोखिमों को प्रबंधित करने के प्रयासों को दर्शाती है। घरेलू रिफाइनरों के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasury) द्वारा रूसी तेल की खरीद की अनुमति देने वाले वेवर (waiver) की अवधि समाप्त हो गई है, जिससे भारतीय ऊर्जा कंपनियों के लिए कानूनी और अनुपालन संबंधी चुनौतियां बढ़ गई हैं।
आगे का रास्ता और बाजार के जोखिम
व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति के समर्थन की पुष्टि तो कर दी है, लेकिन यह बिल अभी भी अमेरिकी सीनेट (US Senate) में कई बाधाओं का सामना कर रहा है। बिल के समर्थक तर्क दे रहे हैं कि भारत और चीन जैसे प्रमुख बाजारों को निशाना बनाना मास्को के तेल राजस्व को खत्म करने के लिए जरूरी है। हालांकि, कुछ रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों ने वैश्विक आर्थिक परिणामों के बारे में चिंता जताते हुए इसका विरोध किया है। भारतीय निवेशकों के लिए मुख्य चिंता इनपुट लागत में संभावित वृद्धि की है। यदि यह कानून लागू होता है, तो ऐसी अत्यधिक टैरिफ व्यवस्था सप्लाई चेन को बाधित कर सकती है या भारतीय रिफाइनरों को अधिक महंगी मंडियों से कच्चा तेल खरीदने के लिए मजबूर कर सकती है, जिससे मुनाफे पर दबाव पड़ने की संभावना है। इस कानून का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि यह सीनेट से पारित होता है या नहीं और अमेरिकी प्रशासन विशिष्ट व्यापार भागीदारों के खिलाफ सेकेंडरी टैरिफ प्रावधानों को कैसे लागू करता है। निवेशकों को इस बिल की प्रगति और व्यापार वार्ताओं पर भारतीय सरकार के किसी भी आधिकारिक संचार पर नजर रखनी चाहिए।
