भारतीय एक्सपोर्टर्स आज अमेरिकी व्यापार नीति पर कड़ी नज़र रखेंगे, क्योंकि 150 दिनों से लागू 10% का अस्थायी इंपोर्ट टैरिफ आज एक्सपायर हो रहा है। अगर सरकार इसे रिन्यू या रिप्लेस नहीं करती है, तो भारतीय सामानों की एक बड़ी खेप पर सामान्य ड्यूटी दरें लागू हो जाएंगी।
Detailed Coverage
एक्सपोर्टर्स के लिए क्या है अच्छी खबर?
इस फैसले से टेक्सटाइल और हैंडीक्राफ्ट जैसे सेक्टर्स को बड़ी राहत मिल सकती है। इन सेक्टर्स में, 10% अतिरिक्त इंपोर्ट ड्यूटी ने प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाला था और अन्य ग्लोबल सप्लायर्स की तुलना में प्राइज कॉम्पिटिटिवनेस को कम कर दिया था। टैरिफ खत्म होने से इन कंपनियों को बड़ी राहत मिल सकती है।
कितना बड़ा है इम्पोर्ट?
ट्रेड डेटा के मुताबिक, अमेरिका को होने वाले भारत के सालाना $87.2 बिलियन के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट का लगभग 92% हिस्सा इन अस्थायी नियमों के तहत आता है। इन सेक्टर्स की कंपनियों के लिए, सरचार्ज हटाने से अमेरिकी बाजार में एंट्री करने वाले सामानों पर टैक्स का बोझ कम होगा।
हालांकि, यह फायदा सभी के लिए नहीं है। स्टील और एल्यूमीनियम जैसे जो प्रोडक्ट्स पहले से ही 'नेशनल सिक्योरिटी ड्यूटी' के दायरे में हैं, वे आज के एक्सपायरी के बावजूद अपनी मौजूदा टैरिफ स्ट्रक्चर के तहत ही रहेंगे।
नए ट्रेड बैरियर्स का खतरा
सेक्शन 122 सरचार्ज का एक्सपायर होना लागत में कमी का रास्ता तो दिखाता है, लेकिन पूरा ट्रेड माहौल अभी भी अनिश्चित है। अमेरिकी सरकार 60 देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर सेक्शन 301 इन्वेस्टिगेशन चला रही है। ये जांच ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी और सप्लाई चेन में लेबर प्रैक्टिसेज जैसी चिंताओं पर केंद्रित है।
इस बात की भी संभावना है कि इसके जवाब में नई कार्रवाइयां हो सकती हैं, जिसमें भारत जैसे देशों के गुड्स पर 12.5% का लेवी लगाया जा सकता है।
टैरिफ के उतार-चढ़ाव का इतिहास
यह अनिश्चितता का दौर एक्सपोर्टर्स के लिए एक वोलेटाइल साल के बाद आया है। अगस्त 2025 से फरवरी 2026 के बीच, कई भारतीय एक्सपोर्ट्स को 50% का बड़ा कंबाइंड लेवी झेलना पड़ा था। यह भारत द्वारा रूस से तेल की खरीद से जुड़े 25% सरचार्ज और 25% रेसिप्रोकल टैरिफ के कारण था। फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद चीजें बदलीं, जिसने कुछ रेसिप्रोकल टैरिफ को स्ट्रक डाउन कर दिया, जिससे मौजूदा अस्थायी सेक्शन 122 उपाय लागू हुआ।
निवेशकों और बिजनेसेज के लिए, यह स्थिति अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी पर निर्भरता को दर्शाती है। जो कंपनियां अमेरिकी बाजार पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच एक स्थायी द्विपक्षीय व्यापार समझौता होने तक इनपुट लागत और प्राइसिंग की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। आने वाले हफ्तों में मुख्य बात यह होगी कि क्या एक्सपायर हो रहे टैरिफ के रिप्लेसमेंट या चल रही सेक्शन 301 इन्वेस्टिगेशन्स के नतीजों को लेकर कोई आधिकारिक नोटिफिकेशन आता है, जो भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए लॉन्ग-टर्म कॉस्ट स्ट्रक्चर को स्पष्ट करेगा।
