ब्रेक्जिट के फैसले के 10 साल बाद, ब्रिटेन की इकोनॉमी में बड़ा बदलाव दिख रहा है। यूरोपीय संघ (EU) से माइग्रेशन नेगेटिव हो गया है, जबकि नॉन-ईयू देशों से आने वालों की संख्या रिकॉर्ड तोड़ है। यूरोपीय संघ के साथ गुड्स एक्सपोर्ट (Goods Exports) में गिरावट आई है, हालांकि सर्विसेज एक्सपोर्ट (Services Exports) ग्रोथ के लिए एक मजबूत सहारा बने हुए हैं। पोस्ट-ब्रेक्जिट उछाल के बावजूद, ब्रिटेन का जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) अब अमेरिका और कनाडा जैसे देशों से पिछड़ गया है, जिसका असर ग्लोबल ट्रेड (Global Trade) पर दिख रहा है।
क्या हुआ 10 साल में?
साल 2016 में हुए जनमत संग्रह, जिसने यूनाइटेड किंगडम को यूरोपीय संघ से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया, उसे अब एक दशक बीत चुका है। इस दौरान के आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि माइग्रेशन पैटर्न, ट्रेड डायनामिक्स और कुल ग्रोथ में खास बदलाव आए हैं। 2021 में सिंगल मार्केट से निकलने के तुरंत बाद ब्रिटेन की इकोनॉमी ने कुछ समय के लिए अन्य विकसित देशों के बराबर प्रदर्शन किया था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। हाल के आंकड़े एक बड़ा ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और धीमा जीडीपी ग्रोथ दिखा रहे हैं, जो हाल के वर्षों में अमेरिका और कनाडा जैसे देशों से पिछड़ गया है।
ट्रेड में आया बदलाव
ब्रिटेन के ट्रेड का स्वरूप काफी बदल गया है। यूरोपीय संघ को होने वाला गुड्स एक्सपोर्ट 2016 में £205 बिलियन से घटकर 2025 में £185 बिलियन रह गया है। एक्सपोर्ट वॉल्यूम में इस गिरावट और लगभग स्थिर इम्पोर्ट (Imports) के कारण, EU के साथ ब्रिटेन का गुड्स ट्रेड डेफिसिट £140 बिलियन के करीब पहुंच गया है।
हालांकि, सर्विसेज सेक्टर की कहानी कुछ अलग है। सर्विसेज एक्सपोर्ट 2016 में £357 बिलियन से बढ़कर 2025 तक £519 बिलियन हो गया है। यह ग्रोथ एक ज़रूरी सहारा प्रदान करती है, लेकिन यह कुल ग्लोबल ट्रेड डेफिसिट की भरपाई के लिए काफी नहीं है, जो कुल इम्पोर्ट में तेज बढ़ोतरी के कारण 2025 में लगभग £65 बिलियन तक बढ़ गया।
माइग्रेशन और लेबर पैटर्न
ब्रिटेन में माइग्रेशन का प्रोफाइल काफी बदल गया है। 2016 के वोट से ठीक पहले के वर्षों में, यूरोपीय संघ के नागरिक नेट माइग्रेशन का 74% से अधिक थे। 2023 तक, यह ट्रेंड पूरी तरह से उलट गया, जिसमें EU से नेट माइग्रेशन नेगेटिव हो गया, क्योंकि कई लोग घर लौट गए या ब्रिटेन आने से कतराए। इसके विपरीत, नॉन-ईयू नेट माइग्रेशन में भारी उछाल आया, जो 2023 में दस लाख से अधिक तक पहुंच गया। इस बदलाव ने लेबर सप्लाई डेमोग्राफिक्स को नाटकीय रूप से बदल दिया है, जिसका खास असर उन उद्योगों पर पड़ा है जो ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय मजदूरों पर निर्भर थे।
ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए इसका क्या मतलब है?
अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए, ब्रिटेन की आर्थिक गतिशीलता इस बात की जानकारी देती है कि कैसे संरचनात्मक नीतिगत बदलाव लंबी अवधि की ग्रोथ को प्रभावित करते हैं। अमेरिका और कनाडा जैसी अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ ब्रिटेन के जीडीपी प्रदर्शन में अंतर, ट्रेड एग्रीमेंट में बड़े बदलावों से जुड़े संभावित जोखिमों को उजागर करता है।
इसके अलावा, सर्विसेज एक्सपोर्ट पर निर्भरता ब्रिटेन की इकोनॉमी को फाइनेंशियल, कानूनी और प्रोफेशनल सर्विसेज की ग्लोबल डिमांड के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। ग्लोबल मार्केट्स को ट्रैक करने वाले निवेशक अक्सर इन रुझानों को देखकर पाउंड की मजबूती और ब्रिटिश उपभोक्ता मांग और ट्रेड फ्लो से जुड़ी कंपनियों की स्थिरता का अंदाजा लगाते हैं।
इन्वेस्टर्स को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, मुख्य निगरानी योग्य कारकों में सर्विसेज ट्रेड सरप्लस की स्थिरता और गुड्स एक्सपोर्ट वॉल्यूम का मौजूदा स्तर से रिकवर हो पाना शामिल है। G7 साथियों की तुलना में जीडीपी ग्रोथ का अंतर मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इसके अलावा, EU माइग्रेशन में गिरावट को देखते हुए ब्रिटेन अपने लेबर मार्केट को कैसे मैनेज करता है, यह भविष्य की उत्पादकता और मजदूरी के दबाव को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक होगा, जो बदले में महंगाई और सेंट्रल बैंक के इंटरेस्ट रेट फैसलों को प्रभावित करेगा।
