कीमतों का ये कैसा खेल?
दुनिया भर में क्रूड ऑयल का बेंचमार्क करीब 90 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया है, जो मई 2026 के दौरान लगभग 20% की गिरावट दर्शाता है। लेकिन, भारतीय ट्रांसपोर्ट सेक्टर को अभी तक इसका कोई खास फायदा नहीं मिला है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) ने केंद्र सरकार से इस मामले पर ध्यान देने की अपील की है। उनका कहना है कि ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों और घरेलू पंप रेट्स के बीच एक बड़ी खाई पैदा हो गई है। ट्रांसपोर्टर्स के लिए यह सिर्फ मुनाफे की बात नहीं, बल्कि एक अस्तित्व की लड़ाई है, क्योंकि डीजल उनके कुल परिचालन खर्च का लगभग 60% होता है।
बाजार क्यों है इतना अलग?
यह स्थिति भारत की फ्यूल प्राइसिंग मैकेनिज्म की एक बड़ी कमी को उजागर करती है। हालांकि, सालों पहले फ्यूल प्राइसिंग को डीरेगुलेट (Deregulate) कर दिया गया था, लेकिन सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) एक मुश्किल संतुलन बनाने को मजबूर हैं। हाल ही में पश्चिम एशिया के संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में आई दिक्कतों के कारण एनर्जी मार्केट्स में काफी उथल-पुथल रही। इंडियन OMCs ने हाल ही में चार साल की प्राइस फ्रीज (Price Freeze) को खत्म किया और मई 2026 में ही कीमतों में चार बार बढ़ोतरी की, ताकि नुकसान को कम किया जा सके, भले ही ग्लोबल कीमतें गिरना शुरू हो गई थीं। ऐसे में, कीमतों के असर में देरी, स्थानीय टैक्स, राज्य-स्तरीय VAT और सेस (Cess) की वजह से ग्लोबल कीमतों में हुई कटौती का फायदा तुरंत आम आदमी तक नहीं पहुंच पा रहा है।
बड़े जोखिम और संरचनात्मक मुद्दे
संस्थागत नजरिए से, यह स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी ऑयल रिटेलर्स को रोजाना करीब ₹600 करोड़ का नुकसान हो रहा है। अगर क्रूड ऑयल की कीमतें इसी तरह वोलेटाइल (Volatile) रहीं तो यह नुकसान और भी बढ़ जाएगा। इसके अलावा, सरकार की कोशिश ग्राहकों को कीमत के झटकों से बचाने की थी, लेकिन इसका उल्टा असर सप्लाई में गड़बड़ी के रूप में सामने आ रहा है। इंडस्ट्रियल खरीदार अब बड़ी मात्रा में बल्क चैनल के बजाय रिटेल आउटलेट्स से फ्यूल खरीद रहे हैं, जहां कीमतें बाजार की सच्चाई को दर्शाती हैं। इससे कुछ जगहों पर फ्यूल की कमी हो रही है और पंपों पर कृत्रिम दबाव बन रहा है। यह स्थिति OMCs के वर्किंग कैपिटल पर दबाव डालने के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन को जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए प्रवर्तन टीमों को तैनात करने पर मजबूर कर रही है, जो बाजार की कार्यक्षमता में एक बड़ी खामी को दिखाता है।
आगे का रास्ता: पॉलिसी की दुविधा
आगे चलकर सरकार के सामने एक बड़ा सवाल है: या तो महंगाई को काबू में रखने के लिए और नुकसान झेले या फिर बाजार के अनुरूप मूल्य निर्धारण तंत्र को अपनाया जाए, जिससे खुदरा महंगाई में अचानक वृद्धि का जोखिम है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर कड़ी नजर रखे हुए है, जो लॉजिस्टिक्स लागत के प्रति संवेदनशील है। ऐसे में, फ्यूल पॉलिसी का रास्ता काफी सीमित है। एनालिस्ट्स का मानना है कि जब तक ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें मौजूदा स्तर से काफी नीचे स्थिर नहीं हो जातीं, तब तक घरेलू फ्यूल कीमतों में बड़ी कटौती की उम्मीद शायद पूरी न हो। इससे लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री को या तो बढ़ी हुई लागत खुद वहन करनी पड़ेगी या फिर भाड़ा दरें बढ़ाकर ग्राहकों पर डालनी पड़ेगी।
