रुपये में तूफानी तेजी: क्या है वजह?
मंगलवार को भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमाल कर दिया। यह 124 पैसे की ज़बरदस्त बढ़त के साथ 90.27 के स्तर पर बंद हुआ। यह पिछले 7 सालों में रुपये की एक दिनी सबसे बड़ी मजबूती है। इस तूफानी तेजी की मुख्य वजह भारत और अमेरिका के बीच संभावित ट्रेड डील की खबरें हैं। हालांकि, सरकार की ओर से अभी कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन इस खबर ने मार्केट का सेंटिमेंट (Sentiment) पूरी तरह बदल दिया। डील की उम्मीदों से विदेशी बाजारों में रुपये के खिलाफ चल रही पोजीशन को भी बंद किया गया, जिससे और मजबूती मिली। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस डील से टैरिफ (Tariff) कम हो सकते हैं, जिससे इक्विटी (Equity) में फॉरेन इनफ्लो (Foreign Inflow) बढ़ सकता है। आम तौर पर, ट्रेड डील की अफवाहों से करेंसी में छोटी अवधि के लिए तेजी आती है, लेकिन अगर डील की डिटेल्स उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं तो करेक्शन (Correction) भी आ सकता है। 2026 की शुरुआत में इमर्जिंग मार्केट करेंसीज़ (Emerging Market Currencies) का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है, डॉलर भी अमेरिकी पॉलिसी की अनिश्चितता और फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की ब्याज दरों में संभावित कटौती के कारण कमजोर हुआ है। भारत का रुपया कम एक्सटर्नल डेट (External Debt) के चलते अपनी पीयर्स (Peers) की तुलना में ज़्यादा स्थिर माना जा रहा है।
बॉन्ड मार्केट की चिंताएं: उधारी का भारी बोझ
दूसरी ओर, सरकारी बॉन्ड मार्केट में भी नरमी देखी गई। 10-साल के बेंचमार्क यील्ड (Benchmark Yield) में करीब 4 बेसिस पॉइंट की गिरावट आई और यह लगभग 6.72% पर आ गया। हालांकि, यह तेजी बहुत देर तक टिकने वाली नहीं लगती। मार्केट में डिमांड-सप्लाई (Demand-Supply) की दिक्कतें लगातार बनी हुई हैं, जिससे यील्ड्स पर दबाव बना रहेगा। पिछले बजट में सरकार ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए रिकॉर्ड ₹17.2 लाख करोड़ के ग्रॉस मार्केट बॉरोइंग (Gross Market Borrowing) का अनुमान पेश किया था। वहीं, नेट बॉरोइंग (Net Borrowing) ₹11.7 लाख करोड़ रहने का अनुमान है और फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) GDP का 4.3% रहने का लक्ष्य है। बॉन्ड मार्केट में इस लगातार सप्लाई का दबाव और फिस्कल कंसर्न्स (Fiscal Concerns) यील्ड्स में किसी भी बड़ी और टिकाऊ गिरावट को रोक रहे हैं, भले ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लिक्विडिटी (Liquidity) को मैनेज करने की कोशिश कर रहा हो। ऐतिहासिक रूप से, बड़े सरकारी उधारी कार्यक्रम हमेशा बॉन्ड यील्ड्स पर ऊपर की ओर दबाव डालते आए हैं।
आगे क्या? डील्स और इकोनॉमी का इम्तेहान
ट्रेड डील की अटकलों के बीच इकोनॉमिस्ट्स (Economists) और एनालिस्ट्स (Analysts) अपने फोरकास्ट्स (Forecasts) को रिवाइज कर रहे हैं। HDFC बैंक की इकोनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता का अनुमान है कि USD/INR की जोड़ी मौजूदा तिमाही में 89-91.50 और फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए 90-92 के बीच ट्रेड कर सकती है। उनके अनुसार, रुपये में मामूली गिरावट की उम्मीद है। कुछ अन्य फोरकास्ट्स के अनुसार, मजबूत फंडामेंटल्स (Fundamentals) और संभावित ट्रेड कैटेलिस्ट्स (Trade Catalysts) के दम पर 2026 के अंत तक रुपया डॉलर के मुकाबले 87.00 तक मजबूत हो सकता है। वहीं, Deloitte का अनुमान है कि भारत की ग्रोथ फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में 7.5-7.8% और फाइनेंशियल ईयर 2026-27 में 6.6-6.9% रह सकती है। रुपये की मजबूती कितनी टिकाऊ होगी, यह काफी हद तक ट्रेड एग्रीमेंट की ठोस डिटेल्स और फॉरेन कैपिटल इनफ्लो (Foreign Capital Inflows) पर निर्भर करेगा। वहीं, बॉन्ड मार्केट पर लगातार नज़र रहेगी कि वह भारी उधारी कैलेंडर और फिस्कल कंसॉलिडेशन (Fiscal Consolidation) पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।