सप्लाई गैप से एक्सपोर्ट्स को बड़ा झटका
भारत के टेक्सटाइल हब, तिरुपूर के एक्सपोर्टर्स एक बड़ी चिंता में हैं। अनुमान है कि 2025-26 के सीजन में कॉटन की 45 लाख बेल्स की कमी हो सकती है। जहां मांग 337 लाख बेल्स तक पहुंचने की उम्मीद है, वहीं सप्लाई सिर्फ 292.15 लाख बेल्स रहने का अनुमान है। इस कमी की वजह से पहले से ही स्पिनिंग मिल्स (Spinning Mills) पर दबाव है और मैन्युफैक्चरर्स (Manufacturers) के लिए लागत बढ़ गई है।
इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा रही मुश्किलें
उद्योग के लीडर्स का कहना है कि कॉटन पर मौजूदा 11% की इंपोर्ट ड्यूटी और डोमेस्टिक सप्लाई की कमी, भारतीय टेक्सटाइल को ग्लोबल मार्केट में महंगा बना रही है। दूसरे देशों के कॉम्पिटिटर्स (Competitors) को सस्ता कच्चा माल (Raw Material) मिल रहा है, जिससे वे दुनिया भर के खरीदारों को कम कीमत पर माल दे पा रहे हैं। इस अंतर की वजह से भारत अपना मार्केट शेयर (Market Share) खो सकता है।
नए ट्रेड डील्स पर भी पड़ेगा असर
हाल ही में भारत ने कई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (Free Trade Agreements - FTA) साइन किए हैं, जिनसे टेक्सटाइल एक्सपोर्ट्स के लिए नए रास्ते खुलने की उम्मीद है। लेकिन, कच्चे माल की लगातार कमी और ऊंची लागत के कारण इंडस्ट्री इन नए डील्स का पूरा फायदा उठाने से चूक सकती है।
किसानों को भरोसा, MSP सुरक्षित
कृषि क्षेत्र की चिंताओं को दूर करने के लिए, इंडस्ट्री लीडर्स ने भरोसा दिलाया है कि इंपोर्ट ड्यूटी कम करने से स्थानीय किसानों को कोई नुकसान नहीं होगा। उनका मानना है कि भारतीय कॉटन की मांग हमेशा मजबूत रहती है। मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) सिस्टम पहले से ही किसानों को सुरक्षा दे रहा है, जिससे उन्हें कम से कम MSP रेट पर कॉटन बेचने की गारंटी मिलती है।
