तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु सीमा को 25 से घटाकर 21 साल करने के लिए संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव दिया है। राज्य सरकार अगस्त में होने वाले विशेष सत्र में इस सुधार को अपनाने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह करने हेतु एक औपचारिक प्रस्ताव पारित करेगी।
Detailed Coverage
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने भारत के चुनावी ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव रखा है, जिसका लक्ष्य लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए लड़ने की न्यूनतम आयु सीमा को कम करना है। वर्तमान में, संसदीय या विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए संवैधानिक आवश्यकता 25 वर्ष है। रेड्डी इस सीमा को घटाकर 21 साल करने की वकालत कर रहे हैं ताकि युवा पीढ़ी की औपचारिक राजनीतिक नेतृत्व में अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके।
चुनावी सुधार के लिए विशेष विधानसभा सत्र
तेलंगाना सरकार ने अगस्त 2026 के पहले सप्ताह के लिए राज्य विधानसभा और विधान परिषद का एक विशेष सत्र निर्धारित किया है। इस सत्र का मुख्य एजेंडा संवैधानिक संशोधन के लिए केंद्र सरकार से आग्रह करने हेतु एक औपचारिक प्रस्ताव पारित करना है। यह प्रस्ताव चुनावी चर्चाओं के एक व्यापक सेट का हिस्सा होने का इरादा रखता है, जिसमें निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन, कुल संसदीय सीटों का विस्तार और महिला आरक्षण कोटे का कार्यान्वयन शामिल है। हालांकि संवैधानिक संशोधनों के लिए संसद स्तर पर राष्ट्रीय मंजूरी की आवश्यकता होती है, राज्य सरकार का यह कदम इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर लाने का एक औपचारिक प्रयास है।
राष्ट्रीय परीक्षाओं पर चिंताएं
अपने राजनीतिक सुधारों के अलावा, मुख्यमंत्री रेड्डी ने राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के संचालन को लेकर मौजूदा शिकायतों को भी संबोधित किया। उन्होंने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE), राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) और राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) जैसी केंद्रीय निकायों द्वारा प्रबंधित परीक्षाओं की पारदर्शिता और निष्पादन पर चिंता व्यक्त की। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय सरकार से छात्र हितों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया, जंतर-मंतर में विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ मामले वापस लेने का अनुरोध किया, और हालिया परीक्षा विवादों से प्रभावित परिवारों के लिए समर्थन मांगा।
निवेशक और आर्थिक संदर्भ
हालांकि ये प्रस्ताव मुख्य रूप से राजनीतिक हैं, चुनावी कानूनों में बदलाव और शिक्षा तथा राष्ट्रीय परीक्षा प्रणालियों पर सरकार का ध्यान लंबे समय में संस्थागत स्थिरता और सामाजिक नीतियों पर प्रभाव डाल सकता है। निवेशक अक्सर ऐसे विधायी एजेंडे की निगरानी करते हैं ताकि राज्य और केंद्र सरकारों की प्राथमिकताओं में संभावित बदलावों का अंदाजा लगाया जा सके, खासकर शैक्षिक बुनियादी ढांचे और युवा-उन्मुख नीतियों के संबंध में। अगली महत्वपूर्ण जानकारी तेलंगाना में विशेष सत्र का परिणाम होगी और यह देखना होगा कि क्या ये प्रस्ताव अन्य राज्य सरकारों के बीच गति पकड़ते हैं या नई दिल्ली में संसदीय चर्चाओं का कारण बनते हैं।
