वित्त मंत्री का बड़ा दावा: 'राज्यों को मिला पूरा हिस्सा'
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में लोकसभा में उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया कि केंद्र सरकार राज्यों को टैक्स ट्रांसफर में पूरा पैसा नहीं दे रही है। उन्होंने सदन को आश्वासन दिया कि सरकार फाइनेंस कमीशन की सभी सिफारिशों का पूरी तरह से पालन कर रही है। सीतारमण ने बताया कि 16वें फाइनेंस कमीशन की 2018-19 से 2022-23 के बीच की समीक्षा के हवाले से कहा कि हर साल राज्यों को कमीशन द्वारा बताए गए सटीक अमाउंट (Amount) का हस्तांतरण किया गया है। उन्होंने यह भी साफ किया कि टैक्स के डिविजिबल पूल (Divisible Pool) का 41% हिस्सा राज्यों को बिना किसी कटौती के दिया जा रहा है। वित्त मंत्री ने कहा कि 2026-27 के लिए राज्यों को टैक्स डिवॉल्यूशन (Tax Devolution) और सेंट्रली स्पॉन्सर्ड स्कीम्स (Centrally Sponsored Schemes) के तहत कुल ₹25.44 लाख करोड़ का अनुमानित हस्तांतरण किया जाएगा, जो पिछले साल से ₹2.70 लाख करोड़ ज्यादा है।
'नेट प्रोसीड्स' का मतलब क्या है?
वित्त मंत्री ने 'ग्रॉस टैक्स रेवेन्यू' (Gross Tax Revenue) और 'नेट प्रोसीड्स' (Net Proceeds) के बीच के अंतर को समझाया। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुसार, 41% हिस्सा 'नेट प्रोसीड्स' पर कैलकुलेट होता है। 'नेट प्रोसीड्स' का मतलब है ग्रॉस टैक्स रेवेन्यू से सीसे (Cesses) और सरचार्ज (Surcharges) जैसी गैर-शेयरेबल (Non-shareable) मदों को हटाने के बाद बची हुई रकम, जिसकी ऑडिटिंग कैग (CAG) द्वारा की जाती है। राज्यों की मुख्य शिकायत यही रही है कि केंद्र सरकार इन सीसे और सरचार्ज पर ज्यादा निर्भर हो रही है, जिससे डिविजिबल पूल का आकार सिकुड़ जाता है। पिछले एक दशक में, केंद्र के ग्रॉस टैक्स रेवेन्यू में सीसे और सरचार्ज का हिस्सा काफी बढ़ा है। FY26 के लिए ऐसे कलेक्शन से ₹5.91 लाख करोड़ की कमाई का अनुमान है। सीतारमण का तर्क है कि इन लेवी (Levy) का फायदा अंततः राज्यों को ही मिलता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था संसाधनों के केंद्रीकरण को बढ़ावा देती है।
16वें फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट क्या कहती है?
हाल ही में पेश हुई 16वें फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट (जो 2026-27 से 2030-31 तक के लिए है) ने वर्टिकल डिवॉल्यूशन रेट (Vertical Devolution Rate) को 41% पर बरकरार रखा है। हालांकि, कई राज्य इसे बढ़ाकर 50% करने की मांग कर रहे थे। इस रिपोर्ट में हॉरिजॉन्टल डिवॉल्यूशन (Horizontal Devolution) यानी राज्यों के बीच फंड के बंटवारे के लिए एक नया मानदंड 'ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) में योगदान' को 10% वेटेज के साथ शामिल किया गया है। इस बदलाव से दक्षिण और पश्चिम के कुछ राज्यों को बड़ा हिस्सा मिलने की उम्मीद है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों को तुलनात्मक रूप से कम, हालांकि कुल राशि में वृद्धि ही होगी। 16वें फाइनेंस कमीशन ने 'रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट्स' (Revenue Deficit Grants) को बंद करने की भी सिफारिश की है, ताकि राज्य अपने राजस्व बढ़ाने और वित्तीय अनुशासन पर ध्यान दें।
अदृश्य संतुलन और राज्यों की चिंता
वित्त मंत्री के दावों के बावजूद, भारत के फिस्कल फेडरलिज्म (Fiscal Federalism) में एक बड़ा स्ट्रक्चरल इमबैलेंस (Structural Imbalance) बना हुआ है। सीसे और सरचार्ज पर केंद्र की बढ़ती निर्भरता, जिन्हें डिविजिबल पूल से बाहर रखा गया है, केंद्र को राज्यों के साथ शेयर किए बिना ज्यादा रेवेन्यू रखने की सुविधा देती है। इससे राज्यों की फिस्कल ऑटोनॉमी (Fiscal Autonomy) पर असर पड़ता है और वे केंद्रीय ग्रांट्स पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। कैग (CAG) ने भी सीसे और सरचार्ज के कलेक्शन की पारदर्शिता और उपयोग पर चिंता जताई है। ऐसे में, 16वें फाइनेंस कमीशन द्वारा रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट्स को बंद करने से पहले से ही कर्ज और राजस्व की कमी से जूझ रहे राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
आगे का रास्ता
जैसे-जैसे 16वें फाइनेंस कमीशन की सिफारिशें 1 अप्रैल, 2026 से लागू होंगी, राज्यों के बीच फंड के हस्तांतरण की गतिशीलता बदलती रहेगी। 41% का वर्टिकल डिवॉल्यूशन रेट और नए हॉरिजॉन्टल फॉर्मूले के साथ, राज्यों के बीच संसाधनों का पुन: आवंटन होगा। हालांकि, केंद्र द्वारा गैर-शेयरेबल सीसे और सरचार्ज के उपयोग का मुद्दा अभी भी अनसुलझा है। भविष्य में, इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्र राज्यों की मांगों और अधिक फिस्कल फ्लेक्सिबिलिटी (Fiscal Flexibility) को किस हद तक संबोधित करता है, जो भारत के कोऑपरेटिव फेडरलिज्म (Cooperative Federalism) के लिए महत्वपूर्ण है।