वैश्विक अनिश्चितताओं और कई बड़ी घटनाओं के संगम ने भारतीय शेयर बाज़ारों में एक बार फिर घबराहट पैदा कर दी है। ट्रेड पॉलिसी में बदलाव, तकनीकी प्रगति (जैसे AI) का असर और भू-राजनीतिक जोखिमों का बढ़ना, ये सभी मिलकर एक मुश्किल ट्रेडिंग माहौल बना रहे हैं।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भले ही राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ (Tariff) लगाने के फैसले को पलट दिया हो, लेकिन इस फैसले से व्यापार नीति की अनिश्चितता ख़त्म होती नहीं दिख रही। राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि वे टैरिफ लगाने के दूसरे रास्ते ज़रूर तलाशेंगे, जिससे वैश्विक व्यापार में तनातनी का माहौल बना रह सकता है। इसके अलावा, 24 फरवरी को होने वाली मंथली F&O एक्सपायरी (Expiry) और 27 फरवरी को आने वाले भारत के तिमाही GDP आंकड़े, बजट नंबर, विदेशी मुद्रा भंडार और इंफ्रास्ट्रक्चर आउटपुट डेटा भी बाज़ार की दिशा तय करेंगे।
दूसरी ओर, IT सेक्टर एक बड़ी मुश्किल में फंसता दिख रहा है। फरवरी 2026 की शुरुआत में Nifty IT इंडेक्स लगभग 19% गिर चुका है। वजह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता प्रभाव। रिपोर्ट्स के मुताबिक, AI अगले 3 से 4 सालों में IT सर्विस रेवेन्यू का 9% से 12% तक कम कर सकता है। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने भी IT स्टॉक्स में अपनी हिस्सेदारी कम की है, जो इस चिंता को और बढ़ाता है।
मगर, बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर लगातार मजबूती दिखा रहा है। फरवरी 2026 के मध्य तक भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी (Liquidity) छह महीने के उच्च स्तर पर है। साथ ही, एसेट क्वालिटी (Asset Quality) और क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) की उम्मीदों ने इस सेक्टर को सहारा दिया है।
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव और वहां अमेरिकी सेना की बड़ी तैनाती ने भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risk) को बढ़ा दिया है। इसका असर क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों पर भी दिख रहा है, जो लगभग $66 प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है, जबकि ब्रेंट फ्यूचर्स (Brent Futures) भी ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं।
फरवरी में FIIs का रुख बदला है। जनवरी में बिकवाली के बाद, FIIs फरवरी में ₹16,912 करोड़ का निवेश करके खरीदार बने। हालांकि, यह निवेश एक जैसा नहीं है; FIIs ने IT से पैसा निकालकर कैपिटल गुड्स, फाइनेंशियल और एनर्जी सेक्टर में लगाया है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) लगातार बाज़ार को सहारा दे रहे हैं और बिकवाली के दबाव को कम कर रहे हैं।
पहले भी अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ ने भारतीय शेयर बाज़ारों में बड़ी गिरावट और अस्थिरता पैदा की थी, खासकर एक्सपोर्ट (Export) पर निर्भर सेक्टर जैसे टेक्सटाइल, ऑटो और मेटल पर इसका असर पड़ा था।
कोर्ट के फैसले के बावजूद टैरिफ को लेकर लगातार अनिश्चितता, AI का IT सेक्टर के रेवेन्यू पर बड़ा खतरा और मिडिल ईस्ट में युद्ध का बढ़ता जोखिम, ये सभी मिलकर बाज़ार के लिए बड़ी चुनौतियां पेश कर रहे हैं। IT कंपनियों के रेवेन्यू और मार्जिन पर असर पड़ सकता है। साथ ही, ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई चेन में गड़बड़ी का भी खतरा बना हुआ है।
विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में बाज़ार एक दायरे में कारोबार कर सकता है। लिक्विडिटी फ्लो (Liquidity Flow) और ग्लोबल सेंटीमेंट (Global Sentiment) बाज़ार की दिशा तय करेंगे। घरेलू संस्थागत खरीद (DII Buying) एक सहारा है, लेकिन भू-राजनीतिक घटनाएं, FIIs के निवेश की दिशा और GDP जैसे डेटा ही बाज़ार को आगे बढ़ाएंगे। उम्मीद है कि बैंकिंग जैसे सेक्टर मजबूत बने रहेंगे, जबकि IT सेक्टर AI की चुनौतियों से जूझता रहेगा।