US Tariffs: वादा फेल, ग्राहकों पर बोझ! अब कानूनी झटके भी

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
US Tariffs: वादा फेल, ग्राहकों पर बोझ! अब कानूनी झटके भी
Overview

अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी अब सवालों के घेरे में है। सरकार की इनकम टैक्स को टैरिफ से बदलने की कोशिश नाकाम होती दिख रही है, क्योंकि इसका पूरा आर्थिक बोझ अमेरिकी ग्राहकों और बिज़नेस पर ही पड़ रहा है। साथ ही, इस नीति पर अब कानूनी अड़चनें भी आ गई हैं।

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टैरिफ पॉलिसी की सच्चाई: ग्राहकों को चुकाना पड़ रहा है भारी दाम

अमेरिकी सरकार का इनकम टैक्स को टैरिफ (Tariff) से बदलने का प्लान अब ज़मीनी हकीकत और कानूनी दांव-पेंच में फंसता दिख रहा है। रिसर्च से यह साफ हो गया है कि इस टैरिफ का लगभग पूरा खर्च अमेरिकी ग्राहक और कंपनियां ही उठा रही हैं, न कि विदेशी। यह सरकार के दावों के बिल्कुल उलट है, जो कह रहे थे कि विदेशी देशों पर इसका बोझ पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और नया टैरिफ दांव

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में एग्जीक्यूटिव अथॉरिटी (Executive Authority) की टैरिफ लगाने की ताकत को सीमित कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे टैक्स लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। इस 6-3 के फैसले ने पिछली कई टैरिफ पहलों को झटका दिया था।

इसके जवाब में, सरकार ने तुरंत 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 के तहत 10% का ग्लोबल टैरिफ लगा दिया है। यह टैरिफ 150 दिनों तक ही लागू रहेगा और इसे कांग्रेस की मंज़ूरी मिलनी होगी। यह नया टैक्स इंपोर्ट (Import) पर लगेगा, लेकिन इसे भी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जैसा कि पहले की योजनाओं के साथ हुआ।

आर्थिक बोझ: असली कीमत कौन चुका रहा है?

आर्थिक शोध (Economic Research) के मुताबिक, यह दावा गलत है कि टैरिफ का भुगतान विदेशी देश करते हैं। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और कांग्रेसियल बजट ऑफिस जैसी संस्थाओं की स्टडीज लगातार दिखाती हैं कि 90-100% टैरिफ का बोझ अमेरिकी कंपनियों और ग्राहकों पर ही आता है। इसका मतलब है कि टैरिफ एक तरह का रिग्रेसिव टैक्स (Regressive Tax) है, जो कम और मध्यम आय वाले परिवारों पर ज़्यादा असर डालता है, क्योंकि वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा सामानों पर खर्च करते हैं।

ऐतिहासिक तौर पर, टैरिफ से घरेलू उद्योगों की प्रोडक्टिविटी (Productivity) बढ़ी है, यह बात साबित नहीं हुई है। बल्कि, इससे ग्राहकों के लिए कीमतें बढ़ती हैं और सामानों का विकल्प कम हो जाता है। न्यूयॉर्क फेड की फाइंडिंग मेनस्ट्रीम इकोनॉमिक थ्योरी (Mainstream Economic Theory) से मेल खाती है। इसके अलावा, इनकम टैक्स से जो लगभग $2.2 ट्रिलियन (फाइनेंशियल ईयर 2023 में) रेवेन्यू आता है, उसे केवल टैरिफ से पूरा करना गणितीय रूप से असंभव है। सबसे ज़्यादा रेट पर भी टैरिफ से इस रेवेन्यू का छोटा सा हिस्सा ही मिल पाएगा, क्योंकि ज़्यादा रेट से इंपोर्ट की मात्रा अपने आप कम हो जाती है।

संभावित खतरे: महंगाई और मार्केट में उथल-पुथल

टैरिफ पर आधारित यह फिस्कल पॉलिसी (Fiscal Policy) कई बड़े खतरों से भरी है। इकोनॉमिस्ट्स (Economists) इसे अस्थिर और आर्थिक रूप से हानिकारक मानते हैं। इतिहास गवाह है कि ऐसे कदम उठाने से महंगाई (Inflation) बढ़ सकती है और मार्केट में बिकवाली (Market Sell-offs) आ सकती है। 2018-2019 में लगाए गए टैरिफ के बाद S&P 500 में बड़ी गिरावट आई थी और कॉर्पोरेट प्रॉफिट (Corporate Profits) पर भी असर पड़ा था। ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) को लेकर मौजूदा अनिश्चितता से बाज़ार पहले से ही चिंतित है, और दूसरे देशों से जवाबी कार्रवाई का डर भी बना हुआ है।

कानूनी अड़चनें और भविष्य की राह

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, एग्जीक्यूटिव ब्रांच के लिए टैरिफ लगाना और मुश्किल हो गया है। भले ही सरकार ने वैकल्पिक कानूनी आधारों का इस्तेमाल किया हो, लेकिन ये उपाय अक्सर अस्थायी (जैसे 150 दिन की सीमा) होते हैं और लंबे समय तक कानूनी जांच के दायरे में रहेंगे। इससे पॉलिसी में लगातार अनिश्चितता बनी रहेगी।

विश्लेषकों को उम्मीद है कि ट्रेड पॉलिसी में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। सरकार नए कानूनी ढांचे के तहत देश-विशिष्ट या सेक्टर-विशिष्ट टैरिफ लगा सकती है। लेकिन, सेक्शन 122 जैसे अस्थायी उपाय लंबे समय तक टिके रहेंगे, यह कहना मुश्किल है। कानूनी लड़ाई और ग्राहकों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को देखते हुए, टैरिफ के ज़रिए बड़े फिस्कल बदलाव की राह आसान नहीं दिखती।

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