तमिलनाडु सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। साल 2026-27 तक राज्य का पब्लिक डेट (Public Debt) बढ़कर **₹10.71 लाख करोड़** तक पहुंचने का अनुमान है। चिंता की बात यह है कि राज्य के टैक्स रेवेन्यू (Tax Revenue) का **35%** हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में जा रहा है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास के कामों के लिए पैसा कम पड़ रहा है।
क्या है पूरा मामला?
तमिलनाडु सरकार इस समय गंभीर वित्तीय दबाव से गुजर रही है। राज्य पर कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है और उसके पास खर्च करने के लिए सीमित गुंजाइश बची है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, राज्य का बकाया कर्ज 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर तक बढ़कर ₹10.71 लाख करोड़ हो जाने की उम्मीद है। यह अप्रैल 2021 के ₹5.13 लाख करोड़ के आंकड़े से लगभग दोगुना है। राज्य का डेट-टू-जीएसडीपी (Debt-to-GSDP) रेशियो भी 28.3% के आसपास बना हुआ है, जो एक बड़ी संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा करता है।
कर्ज और विकास के खर्च में टकराव
सरकार के खाते के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कर्ज चुकाने के चक्कर में विकास के कामों पर खर्च कम हो रहा है। मौजूदा कर्ज पर ब्याज का भुगतान बढ़कर ₹67,050 करोड़ हो गया है, जो अब राज्य के अपने टैक्स रेवेन्यू (SoTR) का 35% हो चुका है। यह ब्याज का बोझ राज्य के सालाना कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) से भी ज्यादा है। नतीजा यह है कि कैपिटल स्पेंडिंग जीएसडीपी (GSDP) के मुकाबले गिरकर सिर्फ 1.44% रह गई है। निवेशकों के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि सड़क, बिजली या पानी जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में जो पैसा लगना चाहिए था, वह अब कर्ज चुकाने में जा रहा है।
रेवेन्यू जुटाने में भी चुनौतियां
कर्ज के अलावा, राज्य सरकार को रेवेन्यू यानी आय बढ़ाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था बढ़ने के बावजूद, जीएसडीपी के मुकाबले कुल रेवेन्यू रिसिप्ट्स (TRR) 2021-22 के लगभग 10% से घटकर 2025-26 में अनुमानित 8.32% रह गई है। रिपोर्ट में आंतरिक टैक्स कलेक्शन में संरचनात्मक कमजोरियों का जिक्र किया गया है, खासकर पिछले दो दशकों में घरेलू टैक्स कलेक्शन के खराब प्रदर्शन पर। बजट की कठोरता भी एक चिंता का विषय है, क्योंकि वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे अनिवार्य खर्चे कुल रेवेन्यू का 64.4% खा जाते हैं, जिससे नई पहलों पर खर्च करने के लिए बहुत कम जगह बचती है।
दूसरे राज्यों से तुलना
राज्यों की वित्तीय सेहत अक्सर निजी निवेश को आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाती है। गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे साथी राज्यों की तुलना में, जिन्होंने महामारी के बाद अपने वित्तीय हालातों को सुधारने के लिए कदम उठाए थे, तमिलनाडु के वित्तीय आंकड़े धीमी रिकवरी का संकेत देते हैं। खपत के लिए उधार लेने पर निर्भरता, न कि पूंजी निवेश पर, राज्य को इन साथियों की तुलना में एक चुनौतीपूर्ण स्थिति में डालता है, जिन्होंने आम तौर पर उच्च स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को बनाए रखते हुए कर्ज के स्तर को अधिक टिकाऊ रखा है।
निवेशकों को क्या ध्यान देना चाहिए?
जिन निवेशकों का पैसा राज्य से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर, म्युनिसिपल बॉन्ड (Municipal Bond) या सरकारी अनुबंधों पर निर्भर कंपनियों में लगा है, उन्हें सतर्क रहना चाहिए। राज्य सरकार की भविष्य की बजट घोषणाओं पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा, खासकर रेवेन्यू बढ़ाने या वित्तीय समेकन (Fiscal Consolidation) के उपायों को लागू करने की किसी भी योजना पर। राज्य-संचालित संस्थाओं की क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) अपडेट और राज्य की उधार लेने की क्षमता में कोई भी बदलाव वित्तीय स्थिरता के महत्वपूर्ण संकेतक होंगे। इसके अलावा, तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर काम करने वाली लिस्टेड कंपनियों से प्रबंधन की टिप्पणी (Management Commentary) राज्य-स्तरीय बजटीय बाधाओं से प्रोजेक्ट की समय-सीमा और भुगतान चक्र पर कैसे असर पड़ रहा है, इस पर जानकारी दे सकती है।
