'सुपर एल नीनो' का अलर्ट: भारत के मॉनसून और अर्थव्यवस्था पर मंडराए बादल? बड़े मौसमी उलटफेर की चेतावनी!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
'सुपर एल नीनो' का अलर्ट: भारत के मॉनसून और अर्थव्यवस्था पर मंडराए बादल? बड़े मौसमी उलटफेर की चेतावनी!
Overview

प्रशांत महासागर में एक दुर्लभ 'सुपर एल नीनो' (Super El Niño) फेनोमेनन बनने की कगार पर है। मौसम पूर्वानुमानकर्ताओं के अनुसार, यह **2026** की गर्मियों तक वैश्विक मौसम के पैटर्न को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकता है और सदी की सबसे शक्तिशाली एल नीनो घटनाओं में से एक हो सकता है।

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'सुपर एल नीनो' बनने की प्रबल संभावना

भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एल नीनो (El Niño) फेनोमेनन का विकास हो रहा है, जिस पर दुनिया भर के मौसम पूर्वानुमानकर्ताओं की पैनी नज़र है। यूरोपीय सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) और अमेरिकी क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर जैसी प्रमुख संस्थानों के फोरकास्ट बताते हैं कि इसके एक दुर्लभ 'सुपर एल नीनो' में बदलने की काफी प्रोबेबिलिटी है। यह एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का गर्म चरण है, जो आमतौर पर प्रशांत महासागर की व्यापारिक हवाओं को कमजोर करता है। इससे समुद्र की सतह का गर्म पानी जमा होने लगता है, जिससे समुद्री सतह का तापमान सामान्य से ऊपर चला जाता है।

अनुमानों से संकेत: एक शक्तिशाली इवेंट की ओर

अमेरिकी राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के अप्रैल 2026 तक के डेटा से पता चलता है कि जून से अगस्त के बीच एल नीनो के विकसित होने की 62% प्रोबेबिलिटी है। यह प्रोबेबिलिटी जुलाई-सितtembre के लिए 70% से अधिक और अगस्त-अक्टूबर के लिए 80% तक बढ़ जाती है। कई मॉडलों के फोरकास्ट भी 2026 की गर्मियों में एल नीनो की स्थिति में ट्रांजीशन (transition) की पुष्टि करते हैं। भूमध्यरेखीय प्रशांत में समुद्री सतह के तापमान में एनोमली (anomaly) लंबे समय के औसत से 2°C से अधिक होने की उम्मीद है, जो एल नीनो की घोषणा के लिए 0.5°C की सीमा को काफी पार कर जाता है। 2026 की शुरुआत से ही ला नीना की स्थिति में तेजी से गिरावट के बाद यह मजबूत एनोमली एक बहुत शक्तिशाली इवेंट का संकेत दे रही है।

पिछली 'सुपर एल नीनो' घटनाओं का वैश्विक असर और भारत पर खतरा

पिछली तीन 'सुपर एल नीनो' घटनाओं - 1982-83, 1997-98 और 2015-16 - ने दुनिया भर में गंभीर व्यवधान पैदा किए थे। 2015-16 की घटना ने रिकॉर्ड ग्लोबल तापमान और बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग जैसी समस्याएं खड़ी की थीं। ये शक्तिशाली एल नीनो इवेंट्स 'क्लाइमेट रिजीम शिफ्ट्स' (CRS) को ट्रिगर कर सकती हैं, जिन्हें जलवायु प्रणाली में अचानक और लगातार बदलाव के रूप में वर्णित किया जाता है। ऐसे बदलाव अक्सर मध्य दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में लंबे समय तक चलने वाले सूखे का कारण बनते हैं और मिट्टी की नमी की स्थिति को नाटकीय रूप से बदल देते हैं। ये भारत के लिए खास तौर पर चिंता का विषय है, क्योंकि एल नीनो आमतौर पर भारतीय मॉनसून की बारिश को कमजोर करता है, जिससे कृषि क्षेत्र और समग्र अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट मंडरा सकता है। मध्य/पश्चिमी उत्तरी प्रशांत, दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर और मेक्सिको की खाड़ी जैसे क्षेत्र समुद्री सतह के तापमान में बड़े बदलाव के हॉटस्पॉट के रूप में पहचाने गए हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.