राज्यों के लिए सख्त राजकोषीय नियम लागू
केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद अब भारतीय राज्य सरकारों को अपने वित्तीय प्रबंधन में और अधिक सख्ती बरतनी होगी। आयोग ने 2026-27 से लेकर 2030-31 तक के लिए राज्यों के फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटे) को उनके ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) के 3% तक सीमित करने का महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। यह कदम देश भर में सरकारी वित्त को मजबूत करने और मैक्रोइकॉनॉमिक स्टेबिलिटी (व्यापक आर्थिक स्थिरता) को बढ़ावा देने के मकसद से उठाया गया है।
'ऑफ-बजट उधारी' पर कसा शिकंजा
आयोग की रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा 'ऑफ-बजट उधारी' (Off-Budget Borrowings) पर चिंता जताना है। यह वो उधारी है जो सीधे सरकारी बही-खातों में दर्ज नहीं होती, लेकिन राज्यों की वित्तीय स्थिति पर भारी पड़ सकती है। वित्त आयोग ने ऐसी उधारी को बंद करने या फिर इसे पूरी तरह से बजट के दायरे में लाने की बात कही है। यदि किसी वजह से ऐसी उधारी लेनी ही पड़े, तो उसका सालाना डिस्क्लोजर (प्रकटीकरण) बजट दस्तावेजों में देना अनिवार्य होगा। कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) भी राज्यों के वित्तीय खातों में इन जानकारियों को शामिल करेंगे। इस कदम से राज्यों की असली वित्तीय सेहत का पता चल सकेगा और पारदर्शिता बढ़ेगी, जिससे उनकी क्रेडिट रेटिंग और उधारी की लागत पर भी असर पड़ सकता है।
कानून में बदलाव की जरूरत
नई राजकोषीय व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए, राज्यों को अपने मौजूदा फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM) कानूनों में बदलाव करने की सलाह दी गई है। आयोग ने देखा कि राज्यों के कानूनों में कुछ विसंगतियां हैं। अब डेफिसिट और कर्ज की परिभाषाओं को इस तरह बदला जाएगा कि 'ऑफ-बजट देनदारियों' को भी इसमें शामिल किया जा सके। 3% की डेफिसिट सीमा का सख्ती से पालन करना होगा। हालांकि, केंद्र सरकार से पूंजीगत निवेश के लिए मिलने वाले बिना ब्याज वाले कर्ज को इस सीमा से बाहर रखा गया है, ताकि बुनियादी ढांचे के विकास में बाधा न आए।
केंद्र सरकार का समर्थन और भविष्य की राह
केंद्रीय कैबिनेट ने 1 फरवरी, 2026 को 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, जो राजकोषीय प्रबंधन पर एक एकीकृत दृष्टिकोण को दर्शाता है। इसी के साथ, केंद्र ने 2026-31 की अवधि के लिए टैक्सेबल पूल (विभाजित कर राजस्व) में राज्यों की हिस्सेदारी 41% पर बरकरार रखी है। यह आवंटन राज्यों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन प्रदान करता है, साथ ही उन्हें तय राजकोषीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रेरित भी करता है। हाल के वर्षों में राज्यों द्वारा घाटे को पूरा करने के लिए बाजार से उधारी लेने का बढ़ता चलन इस निर्देश की अहमियत को दिखाता है। इस समन्वित राजकोषीय नीति से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और भारत की समग्र आर्थिक मजबूती में योगदान मिलेगा।