राज्यों पर कर्ज़ का बोझ बढ़ा: बॉन्ड मार्केट में आ रहे बड़े बदलाव, इन्वेस्टर ज़रूर जानें!

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AuthorMehul Desai|Published at:
राज्यों पर कर्ज़ का बोझ बढ़ा: बॉन्ड मार्केट में आ रहे बड़े बदलाव, इन्वेस्टर ज़रूर जानें!
Overview

भारतीय राज्यों पर कर्ज़ का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे देश का बॉन्ड मार्केट (Bond Market) फंडामेंटली बदल रहा है। स्टेट गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (SGS) का आउटस्टैंडिंग (Outstanding) **FY15** के बाद से करीब **5 गुना** तक बढ़ गया है।

सॉवरेन डेट प्रोफाइल में राज्यों का बढ़ता दबदबा

भारतीय सॉवरेन डेट (Sovereign Debt) परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आ रहा है, क्योंकि राज्य सरकारें अपने बढ़ते फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) को पाटने के लिए मार्केट से खूब उधार ले रही हैं। स्टेट गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (SGS) का आउटस्टैंडिंग FY15 के बाद से लगभग 5 गुना बढ़ गया है, जो कि इसी अवधि में सेंट्रल गवर्नमेंट के डेट की 2.7 गुना ग्रोथ से कहीं ज़्यादा है। यह तेज़ रफ़्तार ग्रोथ यह दर्शाती है कि सालाना राज्यों की बॉरोइंग (Borrowing) सेंट्रल गवर्नमेंट की इश्यूएंस (Issuance) के करीब पहुंच रही है, और FY2026E तक यह लगभग ₹12 लाख करोड़ रहने का अनुमान है। इस बड़े बदलाव से इंडिया के बॉन्ड मार्केट में डिमांड-सप्लाई की डायनामिक्स (Dynamics) बदल रही हैं और राज्यों की मार्केट फाइनेंसिंग पर निर्भरता बढ़ रही है।

लंबी मैच्योरिटी और घटती लिक्विडिटी

SGS इश्यूएंस में हुई बढ़ोतरी के साथ-साथ बॉरोइंग की मैच्योरिटी (Maturity) को भी रणनीतिक रूप से बढ़ाया जा रहा है। FY26 तक SGS इश्यूएंस की वेटेड-एवरेज मैच्योरिटी (Weighted-average Maturity) लगभग 16 साल तक पहुंचने का अनुमान है, जो FY20 में करीब 11 साल थी। इसमें 50% से ज़्यादा नई इश्यूएंस 10 साल से लंबी अवधि की हैं। यह रणनीति कुछ हद तक रिफाइनेंसिंग रिस्क (Refinancing Risk) को मैनेज करने और इंटरेस्ट रेट (Interest Rate) के मौजूदा डाउन-साइकिल का फायदा उठाकर लंबी अवधि के लिए कम यील्ड (Yield) को लॉक करने की मंशा से प्रेरित है। हालांकि, यह बदलाव, अनोखे डेट इंस्ट्रूमेंट्स (ISINs) के बढ़ते प्रचलन और टुकड़ों में इश्यूएंस के पैटर्न के साथ मिलकर, SGS मार्केट में लगातार इलिक्विडिटी (Illiquidity) और बढ़ी हुई टर्म प्रीमियम (Term Premiums) का कारण बन रहा है। ज्यादा लिक्विड गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (G-Secs) के विपरीत, SGS वॉल्यूम G-Sec वॉल्यूम का एक छोटा सा हिस्सा ही रहते हैं, जो एक्टिव ट्रेडर्स (Traders) को हतोत्साहित करते हैं और इन्हें 'बाय-एंड-होल्ड' (Buy-and-hold) इन्वेस्टर या रोल-डाउन स्ट्रैटेजी (Roll-down Strategy) अपनाने वालों के लिए ज़्यादा उपयुक्त बनाते हैं। इन्वेस्टर को एग्जिट लिक्विडिटी (Exit Liquidity) में ज़्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए राज्य और टेनर (Tenor) का सावधानीपूर्वक चुनाव करने के साथ-साथ इनहेरेंट रिस्क (Inherents Risks) की भरपाई के लिए पर्याप्त यील्ड स्प्रेड (Yield Spread) की मांग करना ज़रूरी हो जाता है। कुल मिलाकर राज्य का डेट GDP का लगभग 28% पर बना हुआ है, जो कि प्री-पेंडमिक लेवल 25.3% से ऊपर है।

मार्केट को मॉडर्नाइज करने के लिए सुझाव

Bandhan AMC के AIF & PMS ब्रांड Vedartha की एक रिपोर्ट में स्टेट गवर्नमेंट सिक्योरिटीज मार्केट की स्ट्रक्चरल चुनौतियों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण पॉलिसी रिफॉर्म (Policy Reforms) बताए गए हैं। एक मुख्य सुझाव यह है कि सभी राज्यों के लिए एक सिंगल, स्टैंडर्डाइज्ड यील्ड कर्व (Standardized Yield Curve) बनाया जाए, जिसमें रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा मैंडेटरी इश्यूएंस के लिए 8-10 बेंचमार्क मैच्योरिटीज़ को परिभाषित किया जाए। रिपोर्ट में इश्यूएंस में होने वाले बिखराव को कम करने के लिए नए ISINs के निर्माण को सीमित करने और मार्केट को कंसॉलिडेट (Consolidate) करने के लिए राज्य के 60% बॉरोइंग का पुनः इश्यू होने वाले बेंचमार्क सिक्योरिटीज से होना ज़रूरी करने का भी सुझाव दिया गया है। प्राइसिंग ट्रांसपेरेंसी (Pricing Transparency) को बढ़ावा देने और फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) को प्रोत्साहित करने के लिए, हर राज्य के लिए मैंडेटरी क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) का प्रस्ताव है, जिससे एक पब्लिश्ड स्टेट क्रेडिट स्प्रेड इंडेक्स (State Credit Spread Index) तैयार हो सके। इसके अलावा, बायबैक (Buybacks) के लिए एक पूल्ड SGS कंसॉलिडेशन फंड (Pooled SGS Consolidation Fund) स्थापित करने और स्ट्रक्चर्ड स्विच ऑक्शन (Structured Switch Auctions) को सक्षम बनाने जैसे स्ट्रक्चरल कंसॉलिडेशन (Structural Consolidation) की सिफारिश की गई है ताकि मार्केट एफिशिएंसी (Market Efficiency) बढ़ाई जा सके। हालांकि पहले State Development Loans (SDLs) G-secs पर यील्ड प्रीमियम देते थे, लेकिन यह स्प्रेड कम हो गया है, और सितंबर 2025 में 10-साल के SGS और G-sec यील्ड स्प्रेड 69 बेसिस पॉइंट्स पर देखा गया था। राज्य के डेट इश्यूएंस का बढ़ता वॉल्यूम सॉवरेन बॉरोइंग के बराबर होता जा रहा है, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन (Monetary Policy Transmission) की इफेक्टिवनेस (Effectiveness) पर असर पड़ सकता है और RBI के लिए रेट कट (Rate Cut) के बावजूद बॉरोइंग कॉस्ट (Borrowing Cost) को कम करना कठिन हो सकता है।

बियर केस: स्ट्रक्चरल कमजोरियां और फिस्कल स्ट्रेन

राज्यों द्वारा मार्केट बॉरोइंग पर बढ़ती निर्भरता, खासकर लंबी अवधि के लिए, फिस्कल सस्टेनेबिलिटी (Fiscal Sustainability) और मार्केट स्टेबिलिटी (Market Stability) को लेकर चिंताओं को बढ़ाती है। सेंट्रल गवर्नमेंट की तुलना में राज्यों के पास टैक्स रेवेन्यू (Tax Revenue) के सीमित स्रोत होते हैं, जिससे वे उच्च ब्याज खर्चों को सर्व करने के लिए डेवलपमेंटल खर्चों में कटौती करने के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जो सेंट्रल गवर्नमेंट डेट की तुलना में अधिक जोखिम पैदा करता है। जहां FY2025-26 के लिए सेंट्रल गवर्नमेंट डेट-टू-जीडीपी (Debt-to-GDP) 56.1% है, वहीं राज्य के डेट को शामिल करने पर जनरल गवर्नमेंट डेट-टू-जीडीपी रेशियो 85.3% हो जाता है। कुछ राज्यों में FY 2022-23 तक पंजाब में 40.35%, नागालैंड में 37.15%, और पश्चिम बंगाल में 33.70% जैसे काफी ज़्यादा डेट-टू-जीएसडीपी (Debt-to-GSDP) रेशियो देखे गए हैं, जो ओडिशा के 8.45% से काफी अलग हैं। कई राज्यों द्वारा केवल कैपिटल इन्वेस्टमेंट (Capital Investment) के बजाय करंट एक्सपेंडिचर (Current Expenditure) के लिए बॉरोइंग का उपयोग, जैसा कि CAG रिपोर्ट में बताया गया है, फिस्कल फ्रैजिलिटी (Fiscal Fragility) को बढ़ाता है। एक खास चिंता यह है कि आने वाले वर्षों में राज्य, सेंट्रल गवर्नमेंट को बॉरोइंग वॉल्यूम में पीछे छोड़ सकते हैं, जिससे बॉन्ड मार्केट पर दबाव बढ़ेगा और यील्ड कर्व विकृत हो सकता है। इसके अलावा, रेगुलेटरी एनवायरनमेंट (Regulatory Environment) जटिल बना हुआ है, जिसमें रेट्रोएक्टिव टैक्स रीअसेसमेंट (Retroactive Tax Reassessments) के ऐतिहासिक मामले विशिष्ट क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं, और राज्यों और संबंधित संस्थाओं में पारदर्शिता की सामान्य कमी रिस्क असेसमेंट (Risk Assessment) को जटिल बनाती है।

फ्यूचर आउटलुक: सप्लाई प्रेशर और पॉलिसी इंटरवेंशन को नेविगेट करना

अप्रत्याशित फिस्कल सप्लाई (Fiscal Supply) के कारण इंडियन बॉन्ड मार्केट को सप्लाई अवशोषण (Absorption) की महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सेंट्रल और स्टेट गवर्नमेंट दोनों को मिलाकर कुल सॉवरेन बॉरोइंग, FY27 में लगभग ₹30.5 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जो कि पिछले साल की तुलना में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है। यह भारी सप्लाई बढ़ी हुई यील्ड्स (Yields) का प्राथमिक कारण है, जिसमें हाल ही में बेंचमार्क 10-साल की यील्ड 6.70% के स्तर को टेस्ट कर रही है। अनुमानों के अनुसार इंडिया के यील्ड कर्व में और तेज़ी आने की उम्मीद है, जिसमें 10-साल के बेंचमार्क के अगले कुछ महीनों में 6.60%-6.80% के बीच ट्रेड करने की उम्मीद है। जबकि कुछ सेगमेंट में डोमेस्टिक स्प्रेड्स (Domestic Spreads) आकर्षक बने हुए हैं, मार्केट को इन भारी सप्लाई प्रेशर और ग्लोबल इकोनॉमिक हेडविंड्स (Global Economic Headwinds) से निपटना होगा। इन डायनामिक्स का सफल प्रबंधन, प्रस्तावित पॉलिसी रिफॉर्म्स (Policy Reforms) के कार्यान्वयन के साथ मिलकर, यील्ड्स को स्थिर करने और इंडिया के डेट मार्केट की एफिशिएंसी (Efficiency) सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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