वैल्यूएशन में गड़बड़ी का जाल
रियल एस्टेट ट्रांजैक्शन फाइनल करते समय, प्रॉपर्टी मार्केट में लोग अक्सर इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 56(2) के सख्त नियमों को नजरअंदाज कर देते हैं। जहां कई लोग यह मानकर चलते हैं कि रजिस्टर्ड सेल प्राइस ही टैक्स देनदारी तय करेगा, वहीं हकीकत में सरकारी स्टैंप ड्यूटी वैल्यू को ज्यादा महत्व दिया जाता है। जब ट्रांजैक्शन प्राइस और ऑफिशियल वैल्यूएशन के बीच का अंतर 5% की तय सीमा को पार कर जाता है, तो टैक्स डिपार्टमेंट उस ऊंची वैल्यू को ही असली कंसीडरेशन मान लेता है। इससे सेलर्स को अपनी प्रॉपर्टी पर ज्यादा कैपिटल गेन दिखाना पड़ता है, जिससे बिना किसी असल कैश फ्लो के वे हायर टैक्स ब्रैकेट में चले जाते हैं।
डबल टैक्सेशन का जोखिम
सेलर की कैपिटल गेन लायबिलिटी के अलावा, खरीदार को भी 'अन्य स्रोतों से आय' (income from other sources) के तहत एक बड़े खतरे का सामना करना पड़ता है। टैक्स अथॉरिटीज स्टैंप ड्यूटी वैल्यू और सेल प्राइस के बीच के अंतर को, अगर यह तय सीमा से ज्यादा हो, तो एक 'डीम्ड गिफ्ट' मान लेती हैं। ऐसे में, खरीदार को इस फैंटम गेन को अपनी टैक्सेबल इनकम के तौर पर दिखाना पड़ता है, यानी उन्हें उस फायदे पर टैक्स देना पड़ता है जो उन्हें असल में मिला ही नहीं। बड़े निवेशक और समझदार मार्केट पार्टिसिपेंट्स अक्सर परचेज एग्रीमेंट में स्ट्रिक्ट वैल्यूएशन क्लॉज डालकर इससे बच जाते हैं, लेकिन आम लोग अचानक होने वाले इन टैक्स असेसमेंट के शिकार हो सकते हैं।
कानूनी अड़चनें और समाधान
इन गड़बड़ियों को सुलझाने की कोशिशें अक्सर लंबी कानूनी लड़ाइयों का रूप ले लेती हैं। कानून के तहत डिपार्टमेंटल वैल्यूएशन ऑफिसर से रेफरेंस लेने की अनुमति है, लेकिन इसमें काफी देरी और अतिरिक्त कानूनी खर्च आता है, जिससे प्रॉपर्टी की नेट प्रॉफिट कम हो सकती है। बहुत से सेलर्स गलती से टैक्स अथॉरिटीज से नोटिस आने का इंतजार करते हैं, जिससे उनके विकल्प सीमित हो जाते हैं। समझदार टैक्सपेयर्स आमतौर पर सेल डीड पर साइन करने से पहले ही थर्ड-पार्टी वैल्यूएशन रिपोर्ट ले लेते हैं ताकि वे अपना पक्ष मजबूत रख सकें, हालांकि इनकम टैक्स ऑफिसर के पास यह अधिकार होता है कि वे असेसमेंट के दौरान ऐसे डॉक्यूमेंट्स को स्वीकार करें या न करें।
रियल एस्टेट में स्ट्रक्चरल कमजोरियां
मौजूदा रेगुलेटरी माहौल में इन वैल्यूएशन की आवश्यकताओं में नरमी आने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। चूंकि राज्य सरकारें स्टैंप ड्यूटी रेवेन्यू पर काफी निर्भर करती हैं, इसलिए ऑफिशियल वैल्यूएशन अक्सर मार्केट करेक्शन से पीछे रह जाते हैं या कम ट्रांजैक्शन वॉल्यूम के दौरान कृत्रिम रूप से बढ़ाए जाते हैं। खासकर गिरते बाजार में फंसे सेलर्स ज्यादा कमजोर होते हैं, क्योंकि उन्हें कम कैश ऑफर स्वीकार करने पड़ सकते हैं जबकि सरकारी वैल्यूएशन बेस स्थिर रहता है। यह स्ट्रक्चरल गैप यह सुनिश्चित करता है कि जब तक राज्य-निर्धारित वैल्यू रियल-टाइम मार्केट लिक्विडिटी और आर्थिक हकीकत को नहीं दर्शातीं, तब तक टैक्स डिस्प्यूट का खतरा बना रहेगा।
