साउथ कोरिया में शेयर बाजार में आई भारी गिरावट और लाखों निवेशकों के अकाउंट लिक्विडेट (Liquidate) होने के बाद, सरकार अब रिटेल निवेशकों को सहारा देने के लिए एक नया कदम उठा रही है। अक्टूबर से '1375' नाम की एक डेट काउंसलिंग हॉटलाइन (Debt Counseling Hotline) लॉन्च की जाएगी।
रिटेल निवेशकों को मिलेगा सहारा
हाल ही में साउथ कोरिया के शेयर बाजार में आई भारी गिरावट ने कई रिटेल निवेशकों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। इस मुश्किल घड़ी में मदद के लिए, देश की सरकार अक्टूबर से एक खास नंबर '1375' पर डेट काउंसलिंग हॉटलाइन (Debt Counseling Hotline) शुरू करने जा रही है। इसका मकसद उन निवेशकों को राहत और सलाह देना है जो बॉरोइंग (Borrowed Money) का इस्तेमाल करके ट्रेडिंग करते हुए भारी नुकसान झेल रहे हैं।
बॉरोइंग (Borrowing) का डबल अटैक
मार्केट में गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक थी उधार लेकर (Leveraged Trading) की गई भारी ट्रेडिंग। जून के अंत तक, मार्जिन लोन (Margin Loans) का आउटस्टैंडिंग अमाउंट 38.63 ट्रिलियन वॉन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। जैसे ही शेयरों के दाम गिरने लगे, ब्रोकरेज फर्मों ने मार्जिन कॉल्स (Margin Calls) जारी कर दिए। जब निवेशक इन कॉल्स को पूरा नहीं कर पाए, तो उनके शेयर ऑटोमैटिकली बेच दिए गए। इस वजह से मार्केट पर और दबाव बढ़ा और कई अकाउंट्स लिक्विडेट (Liquidated) हो गए।
निवेशकों को हुआ ₹2.15 ट्रिलियन वॉन का भारी नुकसान
अनुमानों के मुताबिक, सिर्फ एक महीने में रिटेल निवेशकों को 2.15 ट्रिलियन वॉन का भारी नुकसान हुआ है। इस संकट का सबसे बुरा असर युवाओं पर पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लिक्विडेट हुए 320,000 ट्रेडिंग अकाउंट्स में से लगभग 62% निवेशक 20s और 30s की उम्र के थे। इस स्थिति ने एक साधारण मार्केट करेक्शन (Market Correction) को एक गंभीर घरेलू वित्तीय संकट में बदल दिया है।
आगे क्या? कड़े रेगुलेशन की तैयारी?
साउथ कोरिया के फाइनेंशियल रेगुलेटर्स (Financial Regulators) अब बॉरोइंग वाले इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स (Leveraged Investment Products) की भूमिका की जांच कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ETF रीबैलेंसिंग (ETF Rebalancing) ने भी मार्केट की वोलैटिलिटी (Volatility) को बढ़ाने में भूमिका निभाई। अब 1375 हॉटलाइन के अलावा, सरकार बॉरोइंग के नियमों को और सख्त बनाने पर भी विचार कर रही है, ताकि भविष्य में ऐसे हाई-रिस्क (High-Risk) हालात दोबारा न बनें। सरकार का मुख्य ध्यान अभी आम लोगों की वित्तीय स्थिति को स्थिर करने पर है।
