आज यानी बुधवार को भारतीय शेयर बाज़ारों में गिरावट देखी गई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें **$76** प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं। ऊर्जा की कीमतों में इस उछाल और बाज़ार में बढ़ी अस्थिरता ने निवेशकों को जोखिम भरी संपत्तियों से दूर कर दिया, जिससे बिकवाली शुरू हो गई।
भू-राजनीतिक तनाव का बाज़ार पर असर
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक अस्थिरता ने बुधवार को भारतीय शेयर बाज़ारों में बड़ी बिकवाली को जन्म दिया, जिससे निवेशकों का भरोसा डगमगा गया। BSE Sensex 591.29 अंक यानी 0.76 प्रतिशत गिरकर 77,589.43 पर बंद हुआ, वहीं NSE Nifty 50 भी 180 अंक यानी 0.74 प्रतिशत की गिरावट के साथ 24,218.70 पर आ गया। यह गिरावट बाज़ार में व्यापक मुनाफावसूली (Profit-booking) के रुझान को दर्शाती है, क्योंकि निवेशक अमेरिका और ईरान के बीच अचानक बढ़े संघर्ष पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
तेल की कीमतों में उछाल और भारत पर इसका असर
घरेलू बाज़ार के लिए सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा की कीमतों पर सीधा असर है। ब्रेंट क्रूड ऑयल 2.6 प्रतिशत बढ़कर $76.1 प्रति बैरल तक पहुँच गया, जो पिछले 3 प्रतिशत के उछाल के बाद और बढ़ा है। भारत, जो अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर कच्चा तेल आयात करता है, के लिए बढ़ती तेल की कीमतें सीधे तौर पर आयात बिल और महंगाई (Inflation) की चिंता बढ़ाती हैं। निवेशकों को डर है कि लगातार ऊँची तेल की कीमतें विनिर्माण (Manufacturing), लॉजिस्टिक्स और उपभोक्ता क्षेत्रों में कंपनियों के मुनाफे (Profit margins) को प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि इनपुट और परिवहन लागत बढ़ जाएगी।
VIX में तेज़ी, बाज़ार में बढ़ी अनिश्चितता
चिंताओं को बढ़ाते हुए, इंडिया VIX, जिसे 'वोलेटिलिटी इंडेक्स' (Volatility Index) भी कहा जाता है, में 7 प्रतिशत से ज़्यादा की तेज़ी आई और यह 12.47 पर पहुँच गया। यह दर्शाता है कि ट्रेडर्स आने वाले समय में ज़्यादा अनिश्चितता के लिए तैयार हैं। जब यह 'फियर गेज' (Fear Gauge) बढ़ता है, तो अक्सर जोखिम लेने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे संस्थागत निवेशक (Institutional investors) सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख करते हुए इक्विटी में अपना निवेश कम कर देते हैं।
बैंकिंग और करेंसी बाज़ार पर भी प्रभाव
भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने बैंकिंग (Banking) और मुद्रा बाज़ार (Currency markets) के लिए भी एक जटिल माहौल बनाया है। ऊँची तेल की कीमतें रुपये के मुकाबले अमेरिकी डॉलर के मूल्य को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका असर आयात की लागत और विदेशी मुद्रा ऋण (Foreign currency borrowings) वाली कंपनियों के ऋण सेवा (Debt serviceability) पर पड़ेगा। बाज़ार के प्रतिभागी संघर्ष की अवधि और गंभीरता पर नज़र रखेंगे, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में लगातार व्यवधान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply chains) और ऊर्जा सुरक्षा को और प्रभावित कर सकता है। अगले कुछ सत्रों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि ये भू-राजनीतिक तनाव कैसे विकसित होते हैं और क्या अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति क्षेत्रीय अस्थिरता के जोखिम को कम कर पाती है।
