बुधवार को भारतीय शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने बाजार में बिकवाली को हवा दी। निवेशकों ने तेल से जुड़े सेक्टर्स से दूरी बना ली, जबकि अन्य सेक्टर्स में भी दबाव देखा गया।
कच्चे तेल के बढ़ते दाम का असर
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। भारत अपनी तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक स्तर पर ऊंची कीमतें घरेलू कंपनियों के लिए इनपुट लागत बढ़ा सकती हैं और महंगाई को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे कई उद्योगों, खासकर तेल और गैस (oil & gas) और एफएमसीजी (FMCG) जैसे क्षेत्रों के लाभ मार्जिन पर दबाव पड़ता है, जो आज टॉप लूजर्स में शामिल थे। ईंधन की ऊंची लागत का असर सीधे तौर पर उपभोक्ता-केंद्रित कंपनियों के बॉटम लाइन पर पड़ता है, क्योंकि वे मांग को नुकसान पहुंचाए बिना पूरी लागत वृद्धि को ग्राहकों पर नहीं डाल पाते।
सेक्टोरल प्रदर्शन और बाजार की चौड़ाई
हालांकि ज्यादातर सेक्टर्स लाल निशान में बंद हुए, पर प्रदर्शन में भिन्नता दिखी। रियलटी (realty), मेटल (metal) और फार्मा (pharma) जैसे सेक्टर्स ने बाजार में व्यापक गिरावट के बावजूद मजबूती दिखाई और सकारात्मक दायरे में कारोबार करने में सफल रहे। इसके विपरीत, बिकवाली का दबाव व्यापक था, मिडकैप (midcap) और स्मॉलकैप (smallcap) इंडेक्स में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर एडवांस-डिक्लाइन रेशियो (advance-decline ratio) ने सतर्क सेंटिमेंट को उजागर किया, जहां 1,719 शेयरों में गिरावट आई, जबकि 1,357 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए।
तकनीकी सपोर्ट लेवल्स पर नजर
बाजार प्रतिभागी अब ट्रेंड की दिशा का आकलन करने के लिए तकनीकी सपोर्ट लेवल्स (technical support levels) की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। विश्लेषकों ने निफ्टी 50 (Nifty 50) के लिए 24,120 से 24,140 के जोन को एक महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल बताया है। यदि इंडेक्स इस रेंज से ऊपर बना रहता है, तो यह कंसोलिडेट (consolidate) करने का प्रयास कर सकता है। हालांकि, इस सपोर्ट से निर्णायक गिरावट आगे और कमजोरी ला सकती है, जिसमें अगला महत्वपूर्ण स्तर 23,970 से 23,990 के आसपास हो सकता है। दूसरी ओर, 24,370 से 24,390 को तत्काल हर्डल (hurdle) के रूप में देखा जा रहा है। निवेशकों को तेल की कीमतों की आगामी चाल और मध्य पूर्व की भू-राजनीति में किसी भी और विकास पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये घरेलू बाजार में अल्पावधि की अस्थिरता को निर्धारित करेंगे।
